Friday, July 29, 2011

ब्याह की बात

भाभी ने की जो माँ से,
है आज मेरे ब्याह की बात।
मन में मेरे लड्डू सा फूटा।
इक कुँवारे जवान दिल आशिक से,
वर्षो से उसका खुदा जैसे था रुठा।

तन्हाईयाँ डसने लगी थी,
सुंदरियों की खुबसूरत तस्वीरें,
नैनों में मेरे बसने लगी थी।

रोता था रातों को छुपकर,
और दिन में आहे भरता था।

कुँवारी जवानी का बोझ भारी,
दिल पे मै अपने सहता था।

रातों में सपने आती थी,
मुझको दगा दे जाती थी,
कुरेद कर मेरी हसरतों को,
सताती थी और खूब तड़पाती थी।

सदियों के बाद मानों आज,
आई थी वो प्यार की रात।

सुहाने सपनों की रात,
स्वप्न में सुंदरी का साथ।

भाभी ने की जो माँ से,
है आज मेरे ब्याह की बात।

जिंदगी में ना मेरे कोई काम था अब बाकी,
पीने वाला मै ही था,
मै ही मधुशाला और साकी।

लड़खड़ाते कदमों से लुढ़कता रहता रात भर,
परिवार वालों को मेरे कैसे भी पता चले ताकि।
कि पूरा परिवार नहीं है,
कोई काम अभी भी है बाकी,
मेरी दुल्हन है राह देखती,
करवा दो कोई मेरी शादी।

मेरा जीवन तो सूना है,
ये दर्द तो हर दर्द से कई गुणा है।

बिन माँगे ही मिल गयी मुझे तो,
आज कोई सौगात।

भाभी ने की जो माँ से,
है आज मेरे ब्याह की बात।

सेहरा सर पर सजेगा मेरे,
रसगुल्ले,मिठाईयाँ बटवाऊँगा।

कब से था भूखा शादी को,
शादी के रोज खूब खाऊँगा।

गीत सजेंगे होंठों पर,
हर बात तराना बन जायेगा,
अपनी बारात में घोड़ी पर बैठा,
कोई गीत जब मै गाऊँगा।

हाथों में होगा जब किसी का हाथ,
बन जायेगी मेरे किस्से की बात।
मिल जाएगा जो सुंदरी का साथ,
खुबसूरत होगी अब मेरी हर रात।

भाभी ने की जो माँ से,
है आज मेरे ब्याह की बात।

"शादी वो लड्डू है जो खाए वो भी पछताए और जो न खाए वो भी ... तो खा कर ही पछताया जाये :):)"


 हा हा हा हा.....:):)

Tuesday, July 26, 2011

मै साँवला क्यों हूँ?

माँ मुझे तू आज बता दे,
मै साँवला क्यों हूँ?
काले मेघ सा है रंग निखर,
हूँ कृष्ण सा ही मै मनहर,
नैनों की शोभा काजल सा,
मै बावला क्यों हूँ?

माँ मुझे तू आज बता दे,
मै साँवला क्यों हूँ?

पनघट पे मै भी जाता हूँ,
पर कृष्ण सा हर्ष ना पाता हूँ,
अपनी ये रंगत धो लूँगा,
नदियों में मै नहाता हूँ।

सारी ग्वालिने चिढ़ाती है,
गोपियाँ आईना दिखाती है,
सारे लोग मुझसे पूछते है,
मै साँवला क्यों हूँ?

माँ मुझे तू आज बता दे,
मै साँवला क्यों हूँ?

साँवला होना क्यों बुरा है,
ये बात समझ नहीं आती है,
ये साँवला सा रंग मेरा,
मुझे रंगभेद सिखाती है।

राम,कृष्ण भी तो साँवले थे,
पर सब को वो तो प्यारे थे,
फिर मुझको क्यों सब कहते,
मै साँवला क्यों हूँ?
माँ मुझे तू आज बता दे,
मै साँवला क्यों हूँ?

बगिया में अब ना जाऊँगा,
ना ही बंशी बजाऊँगा,
अपने आँचल में छुपा ले मुझे,
वरना मै जी ना पाऊँगा।

जमाने के लिए मै साँवला हूँ,
पर तेरा सलोना लाडला हूँ,
फिर मुझसे सब क्यों पूछते है,
मै साँवला क्यों हूँ?

माँ मुझे तू आज बता दे,
मै साँवला क्यों हूँ?

Wednesday, July 20, 2011

कसक है आज भी दिल में दबी

कसक है आज भी दिल में दबी,
उस रात की कोई।
तुम्हारे पास होकर भी, 
मै तुमको छू न पाया था।

मेरा दिल चाहता था खुद में यूँ भर लूँ मै तुमको आज,
मगर अफसोस मैने हर पल तुमको गवाँया था।

नशा वह रात में था,
या तुम्हारी बात में था,
जो मुझको खींच कर बेसुध बना,
तेरे पास लाया था।

कसक है आज भी दिल में दबी,
उस रात की कोई।

तुम्हारे पास होकर भी मै तुमको छू न पाया था।

बहुत अरमान थे जिनको था पाला,
लम्बे अरसे से,
वही कुछ बोल मेरी आँखों से,
उस रात बरसे थे।

कभी सोचूँ जो तुमको पाने का,
यह ख्वाब है या सच।

नहीं थी तुम कही भी,
बस अंधेरे में मेरा ही साया था।
कसक है आज भी दिल में दबी,
उस रात की कोई।

तुम्हारे पास होकर भी मै तुमको छू न पाया था।

अभी तो रात की सारी कहानी,
पूरी बाकी है।

फलक पर चाँद भी शायद,
अभी अभी ही आया है।

मोहब्बत की कहानी चाँद की थोड़ी पुरानी है,
यही सोचकर मैने नया किस्सा बनाया है।

अधूरा है तेरे बिन,
मेरा होना या ना होना।

तुम्हारे ना होने के एहसास ने,
फिर क्यों मुझको रुलाया था।

कसक है आज भी दिल में दबी,
उस रात की कोई।

तुम्हारे पास होकर भी मै तुमको छू न पाया था।

कहूँगा तो हँस दोगी,
कहोगी झूठे हो।

मगर हर रात यूँ ही जाग कर,
मै भोर करता था।
तुम्हारी यादों से लड़ कर जो,
मेरी हालत होती थी,
तन जिंदा होता था,
बेचारा मन बस मरता था।

सुनोगी तुम नहीं जिस गीत को,
मै जानता था पर।

वही इक गीत मैने हर रात,
क्यों तुमको सुनाया था।

कसक है आज भी दिल में दबी,
उस रात की कोई।

तुम्हारे पास होकर भी मै तुमको छू न पाया था।

Sunday, July 17, 2011

विरहणी सीता

स्वर्णपुरी लंका का वैभव,
जगमग जगमग हुआ आलोकित।
अशोकवाटिका के तरु की छावँ में बैठी,
माँ सीता गुमशुम शुभासित।

ह्रदय मर्म विरहणी बना डाला,
होनी ने क्या कर डाला?

उदास,अशांत प्रियतम से दूर,
माँ सीता को अधीर क्यों बना डाला?

स्वामी! तुम बिन ना जी पाऊँ,
व्याकुल मन को कैसे मनाऊँ?

तुम सूरज मै तुम्हारी किरण,
तुम दीप मै तेरी बाती,
हे प्राणेश्वर! तुम बिन तो हर क्षण,
नैन अश्रु पल क्षीण क्षीण।

वियोग तुमसे मेरे मन का,
अब ये ह्रदय ना सह पाये,
अवसान निकट है तन का,
अब प्राण तन में ना रह पाये।

आ जाओ मेरे परमेश्वर,
रावण की सेना का संहार करो,
अपनी वियोगी,विरहणी भार्या पर,
प्रभु कुछ तो उपकार करो।

अधीर सीता बिलख बिलख कर,
अपनी नीयति पे अश्रु बहा रही थी,
खग,मृग,सुमन और वृक्षों को,
दयनीय दशा सुना रही थी।

रामभक्त हनुमान तभी अशोकवाटिका में पधारे,
बाग की सुंदरता देख,
चकित रह गये अचरज के मारे।

इक वृक्ष के नीचे माँ सीता को,
व्याकुल हो रोते हुये देखा,
किस्मत ने लिखा था हाथों में,
विरह,वियोग का जो लेखा।

गए समक्ष आतुर हनुमान,
माँ की पीड़ा से हो आह्लादित,
परिचय अपना दे मुद्रिका दिखा,
माँ को कर दिया मुदित।

माँ ने पूछा हनुमान कहो,
कैसे तुम सब प्रभु से मिले,
प्रभु से कहना जल्द सेना तैयार कर,
लंका के विध्वंस को चले।

अपनी वियोग की पीड़ा,
कहते कहते रोने लगे नैन,
प्रभु भी आपको याद करते है माँ,
हर पल दिन और रैन।

आँसू पोंछो माँ धीर धरो,
प्रभु जल्द ही आयेंगे,
इन आततायी राक्षसों के चँगुल से,
तुमको जरुर छुड़ाएंगे।

माँ को संदेह हुआ ये सोच,
बानर,भालू की ये सेना कैसे लड़ेगी,
लंका की इस भारी सेना का,
मुकाबला कैसे करेगी?
भीमकाय रुप हनुमान ने,
माँ के समक्ष तब प्रकट किया,
माँ के विश्वास को दे आधार,
बल का इक स्वरुप दिया।

क्या सारे तुम से ही बलशाली,
वानर और भालू है,
हनुमान ने दिलाया माँ को दिलासा,
सब एक से एक जुझारु है।

अब तो तू माँ कुछ धीर धर,
कुछ दिन वियोग और सह ले,
महलों में रहने वाली सुकुमारी,
जंगल में और कुछ दिन रह ले।

जल्द ही हम सब प्रभु के संग,
आकर तुझे छुड़ाएंगे,
अहंकारी दानव का कर मर्दन,
रावण को सबक सिखायेंगे।

राम,लक्ष्मण दोनों सकुशल है,
बस तेरी चिंता सताती है,
बस इक तेरे खातिर ही तो,
दो सुकुमारों को योद्धा बनाती है।

माँ को आश्वासन दे,
चूडामणि ले माँ का चले,
प्रभु को दिखाकर चूडामणि,
माँ से मिलने की बात कहे। 

Friday, July 15, 2011

करो तुम खुद पे भरोसा इतना

करो तुम खुद पे भरोसा इतना,
कभी भी झुकाना पड़े ना सर अपना,
हिम्मत को कभी ना खोना,
हतोत्साहित जरा भी ना होना।
हर मुश्किल जो राहों में है,
हर डगर पर तेरी जाँच है,
इक सफल परीक्षार्थी के लिए,
परिश्रम ही तो सफलता का सव्यसाँच है।

जगाओ दिल में विश्वास इतना,
जागती आँखों से भी देख सको सपना।

करो तुम खुद पे भरोसा इतना,
कभी भी झुकाना पड़े ना सर अपना।

आत्मविश्वास का शीला इतना बढ़ जाये,
हर रुकावट राहों का तेरे सामने झुक जाये।

तूफान भी तुम्हें ना अब डिगा सके,
सोई बदकिस्मती को कोई ना जगा सके।

बढ़ता ही जा तू बस इसी एक चाह में,
है दूर मँजिल तो क्या हुआ?
मै तो हूँ शामिल मँजिल की राह में।

जब डगर का हर इक शूल सुख देने लगे,
समझ लेना मँजिल अब निकट है,
किस्मत खुद राहों को मँजिल का मोड़ देने लगे।

दिखा दो लक्ष्य के लिए जुनून इतना,
असफलता ना पड़े कभी राहों में चखना।

करो तुम खुद पे भरोसा इतना,
कभी भी झुकाना पड़े ना सर अपना।
बार बार गिर कर भी मकड़ी,
मँजिल की चाहत ना खोई थी,
इस तथ्य को ही जान कर,
गौरी ने पृथ्वी राज पर जीत बोई थी।

अगर वह थक कर हार जाता हतोत्साह में,
तो कहाँ मिल पाती जीत उसे जहाँ में।

इन बातों को ही दिल में रख जज्बा रखो,
अपने विश्वास को हर वक्त जवाँ रखो।

बता दो दुनिया को है जीतना,
अधूरा ना रहे जीवन का कोई सपना।

करो तुम खुद पे भरोसा इतना,
कभी भी झुकाना पड़े ना सर अपना।

हर रोज सूरज उगता है,
शाम को फिर डूबता है,
कहाँ वो कभी थकता है।

कभी जो बादल छा जाते है,
कुछ पल में सब चीर निकलता है।

सूरज से सीखो जीवन में,
कैसे गर्मी,बरसात झेलते है,
समय के साथ जीवन में,
कैसे डूब कर फिर से उभरते है।

तुम भी बन जाओ सूरज जैसे,
चमको फलक पे हरदम ऐसे।

करो तुम खुद पे भरोसा इतना,
कभी भी झुकाना पड़े ना सर अपना।

तेरा काफिला गुजरे जहाँ से,
उत्साह,उमंग का सागर बहे वहाँ से।

युवापीढ़ि इसमें गोता लगा के,
चले हरदम सफलता की डगर पे।
पर्वत को भी पार कर सके,
सागर भी बना दे राह,
विश्वास ऐसा हो दिल में,
कि पत्थर पर भी फूल खिला।

करो तुम कुछ ऐसा जतन,
कि पूरी दुनिया करे तुमको नमन।

करो तुम खुद पे भरोसा इतना,
कभी भी झुकाना पड़े ना सर अपना।

Tuesday, July 12, 2011

क्यों होता है?

कभी तुमने ये सोचा है,
जो है वो सब एक धोखा है।
दुनिया दो मुखौटो का खेल है,
जीवन ताउम्र एक जेल है।

हर सजा यहीं सब पाते है,
सुख दुख तो आते जाते है।

कभी तुमने ये सोचा है,
जो है वो सब एक धोखा है।

इंद्रधनुष में सात रंग क्यों होते है,
नैनों को अपने हम क्यों भिगोते है?

क्यों बादल नभ में छाते है,
बिन बरसे ही चिल्लाते है।

बगिया क्यों आँसू बहाती है,
हर सुबह क्यों भींग जाती है?

कभी तुमने ये सोचा है,
जो है वो सब एक धोखा है।

खुशियों में दिल क्यों झूमता है,
किस्मत की हथेली हर कोई क्यों चूमता है?

गुस्से में आँखें लाल क्यों होती है,
उदासी में मन क्यों बोलती है?

आसमां भी कभी कभी क्यों रोता है,
बरस कर वो किसको खोता है?
कभी तुमने ये सोचा है,
जो है वो सब एक धोखा है।

हर इंसान भगवान क्यों नहीं होता है,
आत्मा के बिना शरीर बेजान क्यों होता है?

पापी अपने पापो को गंगा में कैसे धोता है,
जानवरों में घोड़ा खड़ा खड़ा कैसे सोता है?

इक बाप अपने बच्चों में संस्कार कैसे बोता है,
इक डाल में ही एक काँटा और एक फूल कैसे होता है?

कभी तुमने ये सोचा है,
जो है वो सब एक धोखा है।

मन में विचार क्यों आते है,
प्यार में सबलोग दर्द क्यों पाते है?

देश के लिए सैनिक खून क्यों बहाते है,
इक धागे के वास्ते भाई बहन रिश्ता क्यों निभाते है?

जो होते है सबसे प्यारे,
वो हमें छोड़ इक रोज कहाँ चले जाते है?

आती है जब याद उनकी,
तो नैन अश्क क्यों बहाते है?

कभी तुमने ये सोचा है,
जो है वो सब एक धोखा है।

जो होता है वो क्यों होता है?
जो नहीं होता है वो क्यों नहीं होता है?

Saturday, July 9, 2011

यह रात फिर नहीं आयेगी

यह रात फिर नहीं आयेगी,
वो बात फिर नहीं आयेगी।
कितना भी अँधेरा हो जाये,
काजल से कालिमा चुन लाये,
काले घनघोर बादलों से,
बरसात फिर नहीं आयेगी।

यह रात फिर नहीं आयेगी।

यह रात नहीं है बात है प्रिय,
तेरे मेरे अंतरमन का,
तेरा,मेरे होने का क्षण,
मिलन है दोनों के तन का।

घुल कर यह निशा का गीत,
प्रणय के गीत फिर वही गायेगी।

यह रात फिर नहीं आयेगी।

गुमसुम सा अकेला मेरा मन,
तेरे मन से मिला अपनापन,
साथी की जरुरत थी मुझको,
पूरा हुआ मै,तेरा बन।

अब नहीं जरुरत मुझे किसी की,
जब तू,मेरे संग आयेगी।

यह रात फिर नहीं आयेगी।

कुछ ऐसी हलचल सी है जो,
लहराती है,बलखाती है,
हवाओं के संग यादें तेरी,
अब आती है और जाती है।

शंका है हवाओं को भी क्या,
इस बार तुम्हें छू पायेगी।
यह रात फिर नहीं आयेगी।

जैसे-जैसे ढ़लती ये रात,
मन के तरंग में झंकार उठे,
कही दिन की उलझन में खोकर,
मन से मन का ना तार टूटे।

एक बार पड़ गयी गाँठ तो क्या,
फिर प्रीत की डोर जुड़ पायेगी।

यह रात फिर नहीं आयेगी।

Wednesday, July 6, 2011

साई-संगम

शिवजी को श्री राम है प्यारे,
प्रभु राम के शिव है न्यारे,
दोनों के संगम ही तो है,
शिरडीवाले साई हमारे।
साई हमारे शिव-साई है,
साई हमारे साई-राम,
शिरडी की पावन भूमि है,
हमारे लिए साई धाम।

हर कष्टों का एक ही साथी,
साई नाम,साई राम....।

नानक की मुस्कान है मुख पर,
शाने मुहम्मद की शान है तुझ पर,
साई है गोकुल का कन्हैया,
ये ही तो है दुर्गा मईया।

इसके हाथ में है सब की चाभी,
पार करेगा हम सब की नईया।

हर नौका का एक खेवैया,
साई नाम,साई राम....।

कलियुग में बस साई हमारे,
दूर करेंगे हर अँधियारे,
जात-पात का भेद भुला के,
सब आते है इनके द्वारे।

ये तो है शिव से मतवाले,
भोले-भाले,जग को पाले।

करुणा के सागर है साई,
हम बच्चों की ममतामयी माई।

हर अँधियारा दूर करेंगे,
साई नाम,साई राम....।
साई तो है दीन-दयाल,
रखते है हम सब का ख्याल।

हाथ पकड़ कर पार कराते,
जीवन में नयी राह दिखाते,
हर कष्टों को दूर भगाते,
राहों में खुशियाँ बिखराते।

दीन,दुखियों को जिसने पाला,
हम सब का बस एक सहारा।
साई नाम,साई राम....।

साई की कृपा अनंत है भक्तों,
साई दया अनमोल,
सब कुछ पा लोगे तुम इस जग में,
बस अंदर की आँख को खोल।

साई साथ है हर पल इसका नहीं है मोल,
अब मन रट ले हर पल मुख से साई बोल।

हर पल ये कह डोल,
साई नाम,साई राम....।

साई सुधा की बूँद को प्यासा,
बाबा रखो तुम ध्यान जरा सा।

रोम-रोम बस साई बोले,
जीवन में साई रस घोले।
साई चरण में अब नेह लगा के,
जग से अपना नाता तोड़े,
बाबा की भक्ति में खो के,
साई राम से रिश्ता जोड़े।

हर पल बस ये मुख अब बोले,
साई नाम,साई राम....।

कष्टों में जब भी साई पुकारा,
साई ने पल में दुख से उबारा,
हर पल साई साथ हमारे,
ऐसा है विश्वास हमारा।

जब भी दुख से ये मन हारे,
साई ने पल में है सम्भाला,
पापी जगत के हम पापी सारे,
साई ने सब को है तारा।

साई भक्तों का है ये नारा,
साई नाम,साई राम....।

दिल भर जाता है अब मेरा,
आँखों में आँसू आ जाता,
इस जग में था कितना अकेला,
साई जो मेरे साथ न आता।

हर दम मै बस ये गाता,
साई कृपा की कथा सुनाता,
साई है जीवन का सवेरा,
अँधियारी जो दूर भगाता।
कष्टों में डुब जाता बेड़ा,
साई जो ना पार लगाता।

साई जग का साक्षात विधाता,
दया की बारिश मुझपे बरसाता,
मेरा तुझसे ये कैसा नाता,
हर दम मै बस ये ही गाता,
साई नाम,साई राम....।

Sunday, July 3, 2011

यह नहीं अभिमान मेरा

यह नहीं अभिमान मेरा,
कि तू बसता है मुझी में।
सत्य की तू प्रेरणा देता,
जीवंत होकर मेरी सुधी में।

मै भटकता राह जब हूँ,
राह में तू आ कर कहता,
जिन्दगी के इस सफर में,
तू तो मेरे साथ ही रहता।

ह्रदय में प्राण श्वासों सा,
हर क्षण है तेरा बसेरा।

यह नहीं अभिमान मेरा।

भय नहीं मुझको सताता,
सोचता हूँ साथ है तू,
क्या है मेरे पास अपना,
जो मै तुमको भेंट में दूँ।

कर स्वीकार आज मेरे,
नश्वर तन का दान मेरा।

यह नहीं अभिमान मेरा।

दौड़ता मै हूँ कभी ना,
पर समय पर पहुँच जाता,
खोकर अपना सर्वस्व हरदम,
सम्पूर्ण तुमको पा ही जाता।

सारी कृति है तुम्हारी,
है ये सारा ज्ञान तेरा।

यह नहीं अभिमान मेरा।

द्वंद से कारण जो उपजे,
इसका हल तुझमें छुपा है,
मिल रहा सान्निध्य तेरा,
ये भी तो तेरी ही कृपा है।
जब से जाना है तुम्हें मन,
मिल गया है नाम मेरा।

यह नहीं अभिमान मेरा।

साँस मेरी थम रही है,
पास अब कोई नहीं है।

ये जहाँ के ख्वाब सारे,
बस जहाँ में ही सही है।

है मुझे उसकी जरुरत,
जिसे ना अब तक देख पाया,
पर स्वयं के होने में भी,
थी छुपी उसकी ही काया।

हो रहा है अब नहीं दुख,
जाये चाहे प्राण मेरा।

यह नहीं अभिमान मेरा।

Thursday, June 30, 2011

आज नींद भर सो लो....

तुम्हारे होंठ पर रख दी थी,
मैने हथेली अपनी,
और अपनी नज़रों से कहा,
कि कुछ और ना बोलो।
ये मेरा प्यार है नाजुक बड़ा,
दिल टूट जायेगा,
है तुमसे प्यार कितना जान लो,
पर और ना तोलो।

मेरी इन आँखों में देखो,
दिखेगी तस्वीर एक ऐसी,
जो तुमसे मिलती होगी पूरी,
या होगी तुम्हारे जैसी।

छुपे है राज गहरे दिल में,
इन्हें अब राज रहने दो,
कि है जो बंद दरवाजे,
इन्हें तुम और ना खोलो।

यकीन होगा तब तुम्हें,
जब मै ना होऊँगा,
अश्क बन कर आँख से तेरे,
मै जब खूब रोऊँगा।

बना लेना मुझे तब अपना,
पराया मुझे ना यूँ करना,
और अपनी गोद में रख सिर मेरा,
कहना कि आज नींद भर सो लो।

आज नींद भर सो लो.......।

पता नहीं क्या जमाना आ गया है...आज मेरी इस रचना को एक सज्जन ने बड़े शान से अपने आरकुट प्रोफाईल पर डाल दिया और मुझे बताया भी नहीं..पर मेरे कुछ शुभचिंतको ने मुझे बताया...और जब उन्हें तरह तरह के कामेन्ट प्राप्त हुये तो खुद उन्होनें फोन कर के मुझसे माफी माँगा...भाई ठीक है चोरी किजीये.....पर बता कर...."मेरे लिए तो यह गर्व की बात है,कि इतनी कम उम्र में मेरी कविता प्रोफेसरों द्वारा चोरी की जार रही है।"...मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता..."मेरा कवि ह्रदय तो हमेशा मेरे पास है....आप कविता चुरा सकते हो,पर मेरे कवि ह्रदय को कभी भी नहीं पा सकते।".....

Tuesday, June 28, 2011

आज अपने अंत की दहलीज पर....

आज अपने अंत की दहलीज पर,
मै आ खड़ा हूँ।
जी रहा सब जानते है,
मै हूँ जिन्दा मानते है।

पर मै तो इस जिन्दगी में,
जीकर भी कई बार मरा हूँ।

आज अपने अंत की दहलीज पर,
मै आ खड़ा हूँ।

अब नहीं मुझको लुभायेगा तुम्हारा स्नेह निश्छल,
अब नहीं मुझको बुलायेंगे कभी वो भूत के पल।

अब तो मेरे साथ होगा,
एक ऐसा निडर मन,
जो देगा स्वरुप को मेरे,
एक अद्भूत,अदृश्य तन।

मर कर भी मौत से मै,
जाने कितनी बार लड़ा हूँ।

आज अपने अंत की दहलीज पर,
मै आ खड़ा हूँ।

है यहाँ वियोगीयों की फौज सारी,
युद्ध एक घमासान है यहाँ भी जारी।

लोग अब भी जलते है एक दूसरे से,
मौत की ये दुनिया है बड़ी ही न्यारी।

दुष्ट दाँतों में अकेला जीभ सा मै,
असहाय होकर बिल्कुल अकेला सा पड़ा हूँ।

आज अपने अंत की दहलीज पर,
मै आ खड़ा हूँ।

Saturday, June 25, 2011

ऐ जिंदगी मेरी

मेरी आवाज में बैकग्राउंड ध्वनि के साथ यह कविता


कब से तुझे बचाता रहा ऐ जिंदगी मेरी,
क्या था पता इक दिन मुझे ही छोड़ देगी तू कही!
बरसात से,धूप-छाँव से,
नफरत के घिनौने भाव से!
हरदम तुम्हे दूर रखता था,
सुख के सिवा तू कुछ ना चखता था!

मुझको कहाँ था ये पता,
तू भी परायी बन जायेगी!
इक दिन मुझे छोड़ के जहाँ में,
जग से मुझे बिसरायेगी!

हर चोट तुझपे जो आती थी,
दिल दर्द से भर कर रोता था!
ये आँख बरस कर बूँदों में,
दिल के जज्बातों को खोता था!

क्या था पता इक दिन,
ये नूर,ये अंबक भी मेरा ना होगा!
कितने ख्वाब सजाये थे जिन पलकों पे,
वो इक पल में जुदा होगा!

होश में जब से मेरी आहटे थी,
तेरे लिये क्या-क्या ना किया!
ठंडक में जमने,
गर्मी में झुलसने से तुझे बचाता रहा!

बरसात में जो भींगता,
झट से तुझे सुखाता रहा!
हर वक्त तेरे साथ ही कटती थी मेरी जिंदगी,
क्या था पता इक रोज तू बन जायेगी मेरी बंदगी!

बडा़ स्वार्थी है तू क्या कहूँ,
मेरी इक पल ना याद आयी!
भूल गया बस इक झगड़े में,
अपने प्यार की सारी लड़ाई!
तुझसे ही तो रौशन था,
मेरी चाहतों का दीया,
क्यों कर दिया इक पल में सूना,
भावों से मेरा जिया!
क्या पता था तू निकलेगी स्वार्थी मेरी ज़िंदगी!

इक बात तो है तुझसे कहनी,
मेरे बिना ना है तेरी भी जिंदगानी!
मै भी ना कुछ हूँ,ना तू ही है कुछ,
बस साथ में ही बनता है,
हम-दोनों का अस्तित्व!

लौट के कभी जो आ जाना,
मुझे यूहीं खड़ा पाओगी,
क्या था पता तुम कभी लौट के ही ना आओगी!

कब से तुझे बचाता रहा ऐ जिंदगी मेरी,
क्या था पता इक दिन मुझे ही छोड़ देगी तू कही!

Wednesday, June 22, 2011

आत्मा सौंप रहा हूँ

आत्मा सौंप रहा हूँ तुमको,
चिर काल तक करना संरक्षित।
युगों युगों से  व्याकुल मन में,
मधु भावों को करना संचित।

तम में भी ना खोना स्थिरता,
प्रकाश की चकाचौंध में ना होना लोपित।

आत्मा सौंप रहा हूँ तुमको,
चिर काल तक करना संरक्षित।

दिगभ्रमित मनोदशा का करना त्याग,
संसार विमुख धर लेना वैराग,
कलुषित तन के अवसान से ना घबराना,
आत्मा ही है सर्वोपरि दुनिया को दिखलाना।

परमात्मा से आत्मा की मधुर मिलन में ही,
रहना हर क्षण तुम केंद्रित।

आत्मा सौंप रहा हूँ तुमको,
चिर काल तक करना संरक्षित।

नश्वर तो मानव काया है,
आत्मा है युगों से अमर सिंदूर,
भावनाओं के उमरते बादल घनघोर,
प्रपंचों से रहना तुम बिल्कुल दूर।

मन को कुंठित ना करना कभी,
सांसारिकता जो करे तुमको उपेक्षित।

आत्मा सौंप रहा हूँ तुमको,
चिर काल तक करना संरक्षित।

क्षीर सागर अथाह,अनंत है,
भगवान वही मिल जायेंगे,
मोक्षित होगी आत्मा की तस्वीर,
तो श्री चरणों को पायेंगे।

आत्मबल करो इतनी विकसित 
उर नैन को कर लो जागृत।

आत्मा सौंप रहा हूँ तुमको,
चिर काल तक करना संरक्षित।
दाता हूँ मै तुम्हें सौंपता,
स्व अस्तित्व की जगमग लौ,
प्रकाशित करना चिर काल तक,
तम के भावों से प्रज्जवलित भव।

संदेह ना ऐसा हो उत्पन्न,
मै कौन हूँ,तू कौन है?

बस आत्मा ही सत्य है,
तन का अवसान इक मौन है।

रक्त के अक्षरों से लिखना,
भावी जीवन के सुख दुख गीत।

आत्मा सौंप रहा हूँ तुमको,
चिर काल तक करना संरक्षित।

Friday, June 17, 2011

जो ह्रदय स्पंदन हो मुखरित

करना कैसा बहाना प्रिय,
जो ह्रदय स्पंदन हो मुखरित।
मिलन निशा का इक गीत अनोखा,
जो कंठों से फूट पड़े,
खुद पर ना हो जब प्राण का बस प्रिय,
तो प्रेम दिवाने क्या करे।

संगीत जिसका मौन हो,
जो नैनों से ही हो स्वरित।

करना कैसा बहाना प्रिय,
जो ह्रदय स्पंदन हो मुखरित।

वीणा के तार पर फेर उँगली,
गूँजेगा जो इक मधुर धुन,
ह्रदय मेरे तू अधीर ना हो,
स्व स्पंदन के गीत को सुन।

व्याकुल ना हो इस रात फिर प्रिय,
करना अब तू न मन को कुंठित।

करना कैसा बहाना प्रिय,
जो ह्रदय स्पंदन हो मुखरित।

ध्वनि का मिलन हो प्रतिध्वनि से,
मेरे गीत तू जा ह्रदय में समा,
गूँजेगा वो गीत अब यूँ नभ से,
गायेगा प्रणय गीत सारा जहाँ।

बना तू गीत ऐसा जो मन का,
हर ले सारा दुख और विषाद,
तू ना कर अब यूँ एकाकी,
इक क्षण भी जीवन का व्यतीत।

करना कैसा बहाना प्रिय,
जो ह्रदय स्पंदन हो मुखरित।

Thursday, June 16, 2011

पर कर्ण ही साथ निभाया ना

सुनना चाहा वो मधुर गीत,
पर कर्ण ही साथ निभाया ना।
कही दूर से आती वो ध्वनि,
जब कानों से मेरे टकराई,
जगत के बेसुरे ताल में,
जब मधुर गीत गई थी समाई।

बस शोर गुल ही सुन सका,
संगीत जीवन में समाया ना।

सुनना चाहा वो मधुर गीत,
पर कर्ण ही साथ निभाया ना।

जो पिघले हर क्षण मोम सा,
दे जाता है जगमग जीवन,
जो घिस घिस कर चंदन सा,
दे जाता है सुगंध नूतन।

वैसा सुर,लय और ताल सा,
संगीत बना मै पाया ना।

सुनना चाहा वो मधुर गीत,
पर कर्ण ही साथ निभाया ना।

प्रयत्न मेरे हर बार विफल,
कभी ना आया जीवन में कल,
टूटे बस आज के सपने न्यारे,
जो बीते जीवन के सारे पल।

निराश हुआ तब और अधिक,
जब कुछ सुन कर भी सुन पाया ना।

सुनना चाहा वो मधुर गीत,
पर कर्ण ही साथ निभाया ना।

Tuesday, June 14, 2011

मेरे साथ ही हुआ हर बार पक्षपात

मिला हर तन को शांत विश्राम,
थकन के बाद पाया सब ने आराम,
नैनों में सजाये ख्वाब अनूठे,
मिल गया जीवन का वो मुकाम।
नींद ही मुझसे रुठ गयी जब,
नैनों ने बुलाया तुमको हर रात।

मेरे साथ ही हुआ हर बार पक्षपात।

बिखरे मेरे जो लट घुँघराले,
हुये सभी अब प्रेम मतवाले,

मुझको पागल ही कह डाला,
प्रेयसी ने पिलायी जो रुप की हाला।

छलक गये सुधा बूँद से न्यारे,
तेरे मधु अधरों से मुखरित हर बात।

मेरे साथ ही हुआ हर बार पक्षपात।

जागी इक चाह जो मुझको तेरी,
कहने की है बस मेरी मजबूरी,
तेरे द्वार पर दौड़ा आऊँ,
मिटती हर बार है कुछ तो दूरी।

तेरी तरफ मेरे दो नैन,
देखा करते क्यों दिन रैन।

हुआ जो बेचैन तो जग ने समझा,
 कि मिली है मुझे प्यार में मात।

मेरे साथ ही हुआ हर बार पक्षपात।

कोई फूल सुगंध लुटाता है,
तब भींगी भींगी खुशबू जग पाता है,
कोई शूल राह में चुभ जाता है,
फिर भी वो राह दिखाता है।

कभी फूल चुना,कभी शूल बना,
नियति ने दिखाया कठिन हालात।

मेरे साथ ही हुआ हर बार पक्षपात।

पहर दो पहर देखा बस मैने,
सृष्टा और सृजन का अनोखा तालमेल।

सृष्टि की इक सदी जो बीती,
खत्म हुआ कुछ पल सृजन का खेल।
मैने जाना सृजन है मनोहर,
और प्रलय है इक भयावह रात।

मेरे साथ ही हुआ हर बार पक्षपात।

ईश्वर निराकार ही सत्य है,
आकार में उसे न बाँध सका,
सगुण उपासना राह भक्ति की,
निराकार को कभी पा न सका।

मन की पीड़ा हर बार कही,
उस भक्ति के दिव्य ज्योति से,
पर मूर्ति के देवता ने कि ना,
कभी भी मुझसे कोई बात।

मेरे साथ ही हुआ हर बार पक्षपात।

Saturday, June 11, 2011

किससे कहता मै उर की पीड़ा

किससे कहता मै उर की पीड़ा,
जो ठेस लगाया तुमने!
इक क्षण में सब प्यार भूलाकर,
स्वर्ग से धरती पर लाकर,
जैसे तुमने यूँ कह दिया,
मेरे प्यार को हर बार पाकर!

बस मौन रहा मै,क्या कह पाता,
दिल को जो दुखाये अपने!

किससे कहता मै उर की पीड़ा,
जो ठेस लगाया तुमने!

जगा इक दर्द निराला बड़ा,
दर्द में भी प्यार मुस्कुराया,
बस प्यार है वो चीज,
जो गम में भी हँसना सीखाया!

कहने को बढ़े कुछ तुमसे,
क्यों दिल को दुखाया तुमने?

किससे कहता मै उर की पीड़ा,
जो ठेस लगाया तुमने!

मिलन तुमसे है मेरा हर बार अधूरा,
दिल में थी ऐसी उलझने,
इतने रह के हम पास तुम्हारे,
क्यों दो अंजान,अजनबी बने!

होंठो की बाते,दिल की सौगाते,
जो हर बार चाही थी तुमको कहनी,
सुनो आज है रुठ कर,
तुमसे है बहुत कुछ कह दी उनने!

किससे कहता मै उर की पीड़ा,
जो ठेस लगाया तुमने!

Wednesday, June 8, 2011

मै तुम्हारे रंग में अब रंग गया हूँ

मै तुम्हारे रंग में अब रंग गया हूँ,
संग तेरे ही तुम्ही में ढ़ल गया हूँ।
कौन सी पहचान मेरी कौन हूँ मै?
तुम हो मेरे या मै तेरा हो गया हूँ।

ना रही अब सुध मुझे अपने डगर की,
राह,मँजिल,लक्ष्य को मैने भूलाया,
बूँद बन कर बह गया जब आँख से दिल,
तब कही जाकर है मैने तुमको पाया।

मै हूँ तुझमे या कि तेरे ही ह्रदय का,
मेरे ह्रदय में बन बसेरा हो गया हूँ।

मै तुम्हारे रंग में अब रंग गया हूँ,
संग तेरे ही तुम्ही में ढ़ल गया हूँ।

मौन की मालाओं में जो शब्द तुमने,
प्रेम से अपने था स्नेहीत कर पिरोया,
राग से संगीत की वो गूँज जिसको,
मेरे मन की बाँसुरी से तुमने गाया।

ढ़ुँढ़ते है साज अब तो बस तुम्ही को,
साँस बन कर आज तेरी धड़कनों में,
प्राण की पहचान बनकर मै तुम्हारे,
रग में रक्त रक्त सा बन खो गया हूँ।

मै तुम्हारे रंग में अब रंग गया हूँ,
संग तेरे ही तुम्ही में ढ़ल गया हूँ।

है प्रवेश मेरे ह्रदय का तेरे ह्रदय में,
आत्मा से है परमात्मा का मिलन,
मेरा,तेरा हो जाना है स्वप्न मिथ्या,
ये तो है "मै" का "तुम" को नमन।

भूल कर अब लौ सी अपनी जलन को,
मोम सा बन हर पल तुझमें गल गया हूँ। 

मै तुम्हारे रंग में अब रंग गया हूँ,
संग तेरे ही तुम्ही में ढ़ल गया हूँ।

Tuesday, June 7, 2011

आत्मा की प्यास

"आज प्रस्तुत है मेरी लम्बी आध्यात्मिक कविता "आत्मा की प्यास" का शुरुआती कुछ अंश....इस कविता में मृत्योपरांत यात्रा का वर्णन किया गया है और आत्मा का परमात्मा से मिलन को दर्शाया गया है...."

अतृप्त व्यापक आत्मा की चाहतें भी है अतृप्त,
मन में उभरते विचारों ने बना दिया मुझको संदिग्ध।
ऊषा की पहली ओस के बूँदों को पीकर चल पड़ा,
किरणों की छतरी ओढ़ के असहाय ही बढ़ता रहा।

एकांत वन में व्याधों सा,
विमुख संयम का बाँध टुटा,
ना ही मै शिकारी था,
फिर भी पशुता को लाँघ चुका।

वन की खामोशि ही बया करती थी,
आने वाला है तूफान,
भय का ना कोई जुबा होता है,
दिखता नहीं है शैतान।

वृक्षों से पत्ते टुट कर सरवर में तैरना सीखते,
सरवर की बाहें खुल गयी,
पैदा हुआ बूँद सुरमयी,
टीप की आवाज भी कही,
कानों में आहट सी लगी।

मुड़ मुड़ कर सबको देखता,
जाग गया है शायद वन देवता।

विलुप्तता की आवाज थी,
या था मौन का व्रत कोई,
न जाने कहाँ जा छुपे थे,
जँगल के सारे पशु पक्षी।

ग्रीष्म की भीषण विध्वंस भी,
उड़ा रही थी लू की लपट,
पसीने की बूँदे चौंका देती थी,
कोई नरम छुवन का हो स्पर्श।

थक के यूँ चूर हो कर कही,
छावँ की डगर तलाशता,
सरवर से बुझती प्यास न थी,
दो आँखें एकटक मुझे ताकता।

बड़ी चैन सी मिल रही थी,
हर तरु तिलिस्म दिखा रही थी,
हवा के झोंको से रह रह कर,
टहनी आवाज लगा रही थी।

स्वागत मेरा ये हो रहा था,
या मौत का फंदा गले लगा था,
खामोश वन से क्या पूँछू,
पहले ही मै जुबा से कितना ठगा था।

Sunday, June 5, 2011

फिर नया आगाज कर ले

जिंदगी की इस सफर में,
फिर नया आगाज कर ले।
दब गयी जो साँस मन में,
एक नया आवाज भर ले।

देख ले दुनिया को,
फिर हम खूबसुरत नया नया सा,
फिर किसी की चाहतों के वास्ते,
जी ले और मर ले।

जिंदगी की इस सफर में,
फिर नया आगाज कर ले।

टुट कर बिखरोगे जो तुम,
क्या मिलेगा टुटने पर,
तुम ही होगे कल के सपने,
टुटते को जोड़ दो गर।

इसलिए हे पथिक! मत थक,
दूर तक तू हँस के चल ले।

जिंदगी की इस सफर में,
फिर नया आगाज कर ले।

कल तू क्या था वो पुरानी बात हो चुकी है,
सर झुकाता था जहाँ तू,
वो सर आज तेरे सामने झुकी है।

वक्त का है खेल सारा,
जिसने है सब कुछ सीखाया,
दौड़ कर तू राह में,
फिर वक्त के पंजों को धड़ ले।

जिंदगी की इस सफर में,
फिर नया आगाज कर ले।