मुझमे ही छुपे हैं वो दोनों रंग,
जिन्हें देख रह गया मै तो दंग।
कभी सामने आकर लुभाते हैं,
कभी चलते हैं मेरे संग संग।
मुझमे ही छुपे हैं वो दोनों रंग।
कभी हँसते हैं,कभी रोते हैं ,
कभी जागते,कभी सोते हैं।
यूँही वह बदल कर रुप मेरा,
करते रहते हैं मुझको तंग।
मुझमे ही छुपे हैं वो दोनों रंग।
बन जाते हैं भगवान कभी,
कभी लगते हैं शैतान वही,
कुछ भी है पर इस रंग बिना,
तन में मेरे है प्राण नहीं।
रंगीन ये मन क्यों ना समझ सका,
"मै" से "मै" की यह कैसी जंग?
मुझमे ही छुपे हैं वो दोनों रंग।
दर्पण से मुझे दिखलाते रंग,
अंतरमन के वे सारे अंग,
जिससे मानव भगवान बने,
चंदन से भी लिपटा रहे भुजंग।
जिसके बिन जीवन खाली,उजड़ा,
मन बन जाता है कोई पतंग।
मुझमे ही छुपे हैं वो दोनों रंग।
जिन्हें देख रह गया मै तो दंग।
कभी सामने आकर लुभाते हैं,
कभी चलते हैं मेरे संग संग।
मुझमे ही छुपे हैं वो दोनों रंग।
कभी हँसते हैं,कभी रोते हैं ,
कभी जागते,कभी सोते हैं।
यूँही वह बदल कर रुप मेरा,
करते रहते हैं मुझको तंग।
मुझमे ही छुपे हैं वो दोनों रंग।
बन जाते हैं भगवान कभी,
कभी लगते हैं शैतान वही,
कुछ भी है पर इस रंग बिना,
तन में मेरे है प्राण नहीं।
रंगीन ये मन क्यों ना समझ सका,
"मै" से "मै" की यह कैसी जंग?
मुझमे ही छुपे हैं वो दोनों रंग।
दर्पण से मुझे दिखलाते रंग,
अंतरमन के वे सारे अंग,
जिससे मानव भगवान बने,
चंदन से भी लिपटा रहे भुजंग।
जिसके बिन जीवन खाली,उजड़ा,
मन बन जाता है कोई पतंग।
मुझमे ही छुपे हैं वो दोनों रंग।




































