Friday, February 24, 2012

एक पौधा तुलसी का

मेरे आंगन में मुरझाते हुये तुलसी पौधे को समर्पित......

एक पौधा तुलसी का,
आँगन में मेरे।

प्रार्थना,आराधना करता रहा है।
सुख के क्षण में प्राण वायु दान बन,
क्लेश में संताप से मरता रहा है।

अपने जड़ में वह छुपाये,
शांति और स्नेह धारा,

तीव्रतम वायु ने छीना,
तरु से जब  पत्र सारा।

करुण पीड़ा भी सहा वो,
वृक्ष वट का बन बड़ा सा,

दे रहा बस नया जीवन,
हरित देव फिर है हारा।

मृत्यु की सीमा पे भी,
वह दौड़,दौड़,

जिंदगी की खातिर लड़ता रहा है।

एक पौधा तुलसी का,
आँगन में मेरे।

प्रार्थना,आराधना करता रहा है।

मँजरी से लद गया था तन सुकोमल,
देव को होता था अर्पित जब तुलसी दल,

वरण जिसका खुद किये थे ईश विष्णु,
तरु वह खोता रहा है निश दिन स्व बल।

कर रहा था खुद में संचित,
पुण्य का प्रकाश हर क्षण,

सू्र्य का अवतार वो ही,
तम से अब डरता रहा है।

एक पौधा तुलसी का,
आँगन में मेरे।

प्रार्थना,आराधना करता रहा है।

तितलियों का क्रीड़ा साथी,
मेरे घर का बुजुर्ग था वो,

छोटे बच्चों का खिलौना,
बूढ़ों का हमदर्द था वो।

उसकी रंगत में है दिखती,
मेरी माँ की बस दुआयें,
अर्घ्य स्नेह का,नेह का,
हर चोट का मेरे उपाय।

जाने से उसके गया है,
वैद्य घर का एक पुराना,

पल में जो हर दर्द मेरा,
हर घड़ी हरता रहा है।

एक पौधा तुलसी का,
आँगन में मेरे।

प्रार्थना,आराधना करता रहा है।

Sunday, February 19, 2012

मेरे दुख तूने साथ निभाया

मेरे दुख तूने साथ निभाया।

तब जब कोई न था अपना,
टूट चुका था हर एक सपना।

घर था पर न थी छत ऊपर,
बारिश से भींगा तन तर,तर।

अन्न नहीं थे,वस्त्र नहीं थे,
आँसू के दो बूँद सही थे।

खारेपन में अपनत्व मिलाकर,
तू गागर में सागर भर लाया।

मेरे दुख तूने साथ निभाया।
साँझ ढ़ली जब बैठ अकेला,
जीवन की अंतिम थी बेला।

बीते कल पर हर्ष मनाता,
सुख जब द्वार न मेरे आता।

कष्ट में बन कर मेरी श्रद्धा,
भक्ति का मार्ग दिखाया।

मेरे दुख तूने साथ निभाया।

सब ने मेरा साथ छोड़ा,
श्वांस बचा था थोड़ा,थोड़ा,
नयन बंद थे,भय था भीतर,
ह्रदय पृष्ठ रह गया था कोरा।

शब्द बना तू हर एकांत का,
छन्द बनी अंतस की पीड़ा।

पन्नों में कह गया तू वो सब,
जो मै कभी ना कह पाया।

मेरे दुख तूने साथ निभाया।

सुख था तो मै जग को जाना,
राग,द्वेष का ताना,बाना,
नहीं रहेगा कल जो क्षण भर,
व्यर्थ है उसको पाना।
छुटे साथी,रिश्ते टूटे,
सुख का साथ जो छुटा।

ज्ञात हुआ तब खुद का मुझको,
तूने मुझे,मुझसे ही मिलाया।

मेरे दुख तूने साथ निभाया।

Tuesday, January 31, 2012

रात को आभास है स्वर्णिम सुबह की

रात को आभास है स्वर्णिम सुबह की।

तीमिर है काली,भयानक पास आती,
नयनों की ज्योति है जैसे दूर जाती।
थक गया है प्राण और निर्माण सारा,
बोझ से दब सी गयी है सब की छाती।

वह जो मुस्कुरा रहा है देख मुझको,
आँसू भी है मोती जैसे दिल के तह की।

रात को आभास है स्वर्णिम सुबह की।

मैने कितने किस्से लोगों से सुने थे,
जिंदगी का नाम जीना ही नहीं है।

मर गया गर कोई खुद के वास्ते तो,
मरना भी बस विष का पीना ही नहीं है।

जिंदगी में देखे है कई मौत मैने,
उसके तन से मेरे मन के रमणिक सुलह की।

रात को आभास है स्वर्णिम सुबह की।

वह किरण बन कर मेरे अँधियारी गलियों,
में यहाँ से रोज वहाँ तक आता जाता।

उसके पद्चापों की सुमधुर ध्वनि,
क्या पता क्यों दिल को मेरे आज भाता।

कई घड़ी ऐसा हुआ है,बिन कुछ सोचे,
दूर तक मै उसके पिछे पीछे जाऊँ।

पर अचानक चौंक जाये चौंधियाती आँखें,
चाह कर भी लक्ष्य से जब मिल ना पाऊँ।

काँटों पे चलता रहा हूँ जिंदगी भर,
कोई तो इक राह मिले कल्पित सुमन की।

रात को आभास है स्वर्णिम सुबह की।

गूँजती है दस दिशायें,हर तरु यह पूछता है,

मन अनुतरित है तो क्यों है,
क्यूँ नहीं कुछ सुझता है।
आते है मदमास,सावन,
फिर बसंत,फिर पतझड़ आता।

जख्मों पर कुछ नमक का कण,
देह को मेरे जलाता।

हार जाती मेरी चाहत और मेरी अभिलाषाएं,
जीत होगी नींद पर कब?

मेरे भावी,पलछिन सुपन की।

रात को आभास है स्वर्णिम सुबह की।

Friday, January 20, 2012

हे देव.....

हे देव! तुम्हारी बाँसुरी में आखिर कैसा जादू है,
मै हरदम सोई रहती हूँ,नशे में खोई रहती हूँ।
जब भी तुम मेरे मन के उपवन में हौले से आते हो,
और अपनी नटखट अदाओं से मुझे दिवाना बनाते हो।

ऐसा लगता है कि मै कोई नहीं हूँ,
मै तो उस यमुना का वो किनारा हूँ,
जहाँ तुम अक्सर बैठकर बाँसुरी बजाते हो।

कई बार पूछना चाही तुमसे,
कई बार देखना चाही तुमको,
पर हर बार मेरी योजनायें विफल हो गयी तुम्हारे सामने।

शायद मै समझ ना सकी,
खुद को बिना दर्पण कैसे देख पाउँगी मै।

जमाना भले ही तुम्हें भगवान कहता हो,
पर मै जानती हूँ तुम वही माखनचोर हो ना,
जो गोकुल में हर ग्वाले के यहाँ से,
माखन चुरा चुरा के खाते हो।

लोग मानते हो तुम्हें महाभारत के समर का,
एकमात्र नायक....
क्योंकि सबकुछ तुम्हारी ही माया का स्वरुप था।
पर मै जानती हूँ तुम वही रणछोड़ हो,
जो युद्ध से भागता भागता छुप जाता है।

मै जानती हूँ देव! तुम मेरे नहीं हो,
तुम तो उस राधा के हो ना,
जिसके साथ तुम अक्सर रास लीला किया करते थे।

जब तुम उस मीरा के नहीं हो सकते,
जो तुम्हारी खातिर विष भी पी लेती है,
तो भला मेरे कैसे हो सकते हो।

मै तो हरदम बस तुम्हारी मायानगरी में व्यस्त रहती हूँ,
पर हे मायावी! मै जानती हूँ कि,
बस तुम ही हो यहाँ और तुम ही हो वहाँ,
जो मुझे जानते हो.......

कि मै अब भी तुमको कितना चाहती हूँ।

हे देव! तुम मेरी आँखों में झाँकना चाहते हो ना,
तो देखो मेरी आँखों में यमुना समायी है।

तुम ही कहो ना कैसे मिलाऊँ नजर,
इस यमुना में तो आज बाढ़ आयी है।
मै जानती हूँ तुम बाल कौतुहल करते करते,
यमुना में भी चले आते हो,
कभी आओ ना मेरी इस यमुना में मेरे माधव!

कोई नहीं है इस यमुना के किनारे बंशी बजाने वाला,
हे बंशीधर! समा जाओ ना मेरी नजरों में,

कि हर ओर बस तुम ही दिखो,बस तुम ही.............।

Tuesday, December 27, 2011

दर्द की नायिका

तुम दर्द की नायिका,
और मै नायक उस अभिनय का,
जहाँ बस दर्द के ही रास्ते पे,
चलता रहा हूँ मै।
छुपा लिया है मैने,
दर्द की इक पुरानी,
नदी दिल में कही।

जो कभी कभी बूंदे बनकर,
बहती रहती है मेरी इन आँखों से।

कभी हर मंजर दिखा देती है,
सामने उस रात को,
जिनमें तुम्हारे साथ था मै।

मेरा यह अभिनय शायद,
उम्र भर का है,
और दर्द से यह वास्ता भी,
पुराना है।

तभी तो निभाता रहा हूँ,
पूरी ईमानदारी से अपना पक्ष हरदम,
ताकि अपने पात्र को सजीव कर सकूँ।

अचानक कोई तूफान सा आता है,
मेरा घर,मेरा रंगमंच,
मेरा अस्तित्व ही मिट जाता है।

मेरी दर्द की नायिका अब सामने,
नहीं है मेरे,
पर यह दर्द मुझे एहसास कराता है,
तुम्हारे इस अभिनय में कभी होने का।

तुम्हें ढ़ूँढ़ता रहता है यह दर्द का नायक,
अपनी दर्द की नदी में,
भावनाओं की एक नाव पर बैठा।

बस चलता जाता है,
चलता जाता है।

अभी भी शायद इक लगन है,
दिल में कही,
कि डूबता वो हमसफर,
मिल जाये फिर।
हवायें बहती है,
साँसे चलती है,
और हौले हौले मन में इक,
भय समा जाता है।

क्या अब इस अभिनय में यह,
दर्द का नायक अपनी,
नायिका के बिना ही रहेगा।

समय बीतता है,
हर जख्म भरता जाता है,
और आदत हो जाती है उसे,
तुम्हारे बिन रहने की।

तुम्हारी स्मृतियाँ,तुम्हारा स्पर्श,
सब कुछ धीरे धीरे,
तुम्हारे साथ ही बह सा जाता है,
मेरी दर्द की नदी में।

कभी फिर तूफान आता है,
फिर हवायें तेज चलने लगती है,
और तुम्हारी आहट मेरे चित्रपट पर,
गूँजने सी लगती है।

दौड़ता हूँ कुछ दूर तक,
पीछे पीछे तुम्हारे,
पर अचानक ठहर जाता हूँ मै,
क्योंकि वहाँ आधार नहीं है,
एक गहरी खायी सी है अब,
मेरे और तुम्हारे बीच।

मै अब भी झूठे अभिनय में,
जी रहा हूँ,
अपने दर्द के साथ,
और तुम दर्द की नायिका,
दर्द से कोसों दूर जा चुकी हो।
फिर भी दर्द का रिश्ता मेरा,
और तुम्हारा खींच लाता है,
तुम्हें हमेशा,
पुरानी यादों के सहारे।

अक्सर अपने दर्द के नायक के पास।

Thursday, December 22, 2011

गीत तुमको ढ़ूँढ़ता है

आखिरी पल का अकेला,
गीत तुमको ढ़ूँढ़ता है।
रुक न जाये श्वास वेला,
मीत तुमको ढ़ूँढ़ता है।

स्नेह का आकाश अब भी,
नेह का दो बूँद माँगे,
अश्रु का प्रवाह बह-बह,
नैनों की फिर बाँध लाँघे।

सिसकियाँ देती है मेरे,
सर्द रातों की गवाही,
तेरे पीछे-पीछे चलता,
बन गया मै प्रेम राही।

सुनहरी रातों का प्रणय रीत,
तुमको ढ़ूँढ़ता है।

आखिरी पल का अकेला,
गीत तुमको ढ़ूँढ़ता है।

किस अधर ने किस घड़ी था,
कंठ से उसको सुनाया,
और वह था गीत कैसा,
जो मेरे अंतस में छाया।

गीत तो था मानो ऐसा,
मौन ने हो शब्द पाये,
चैन की दो बूँद मानो,
विरह के क्षण माँग लाये।

श्वास के बिन फिर बूझा,
संगीत तुमको ढ़ूँढ़ता है।

आखिरी पल का अकेला,
गीत तुमको ढ़ूँढ़ता है।
इससे पहले भी था आया,
राग का प्रवाह मुझमे,
और रातें भी बन आयी,
प्रेम का गवाह मुझमे।

ह्रदय तारों में अजब सी,
एक हलचल उठ रही थी,
प्रेम का हर राह मानो,
मुड़ गया तेरी गली में।

मौन पर फिर सिसकियों का,
जीत तुमको ढ़ूँढ़ता है।

आखिरी पल का अकेला,
गीत तुमको ढ़ूँढ़ता है।

नींद में अब भी है जागी,
याद की सारी कहानी,
भूल कर तुमने किया है,
प्यार पर कोई मेहरबानी।

अब भी आँखें ढ़ूँढ़ती है,
दर-ब-दर बस तुमको ही क्यों,
लुट गयी जब जिन्दगी,
मस्ती मेरी,अल्हड़ जवानी।

कुछ नहीं पर जो बचा वो,
प्रीत तुमको ढ़ूँढ़ता है।

आखिरी पल का अकेला,
गीत तुमको ढ़ूँढ़ता है।
है प्रतीक्षारत नयन किस घड़ी,
प्रेयसी निकट आये,
कंठ के बिन स्वर सजाकर,
कैसे कोई गीत गाये।

चूभ रही है हर घड़ी,
दर्पण तुम्हारी इस नयन में,
स्नेह की अग्नि बिना,
है लौ कैसा इस हवन में।

कँपकँपाती होंठों पे वो ओस जैसा,
प्रलयंकारी शीत तुमको ढ़ूँढ़ता है।

आखिरी पल का अकेला,
गीत तुमको ढ़ूँढ़ता है।

Thursday, December 8, 2011

रुला के तुमको खुद रो दिया मै

मेरी सौवीं पोस्ट.......

रुला के तुमको खुद रो दिया मै,
गुनाह ये कैसा किया मैने।
बेवजह अश्रु के मोतियों को,
तेरे नैनों में भर दिया मैने।

दर्द देकर दर्द की ही,
इक नदी में बह गया मै।

रुला के तुमको खुद रो दिया मै।

क्यों नहीं मै जान पाया,
तुमको ना पहचान पाया,
प्यार को नफरत समझकर,
हर बार तेरा दिल दुखाया।

जानता था है गलत यह,
पर यह गलती क्यों किया मैने?

रुला के तुमको खुद रो दिया मै।

पास तेरे दर्द अपना कह ना पाया,
क्या कहूँ तुम बिन तो इक पल,
रह ना पाया।

तुम चली गयी तो लगा कि दूर मुझसे,
जा रहा है आज खुद मेरा ही साया।

साँस के बिन बस तड़प कर रात काटी,
और दिन के उजालों में भी तुम बिन जिया मै।

रुला के तुमको खुद रो दिया मै।

साथ मेरे अब नहीं है कोई साथी,
दूर है खुशियों की सज,धज और बाराती।

राहों में मँजिल से अपने खो गया हूँ,
क्या था मै और आज कैसा हो गया हूँ?

जानता हूँ सामने है प्याले में जहर,
रात है घनघोर अब ना होगा सहर।

पर न जाने प्यास है कैसी ये मेरी,
भर के प्याला जहर को हर बार पिया मैने।

रुला के तुमको खुद रो दिया मै।

चाहता हूँ पाना मै ना उपहार कोई,
गैर से भी ना करे ऐसा व्यवहार कोई।
मानता हूँ दिल दुखाया मैने तेरा,
पर नहीं था दर्द देना आवेग मेरा।

हूँ खड़ा बन कर मै तेरा गुनहगार,
हर सजा कबूल है तेरे वास्ते यार।

कह दे तू तो अंत अपना कर दूँ मै,
टूट कर शाखों से दामन भर दूँ मै।

टूटने,जुड़ने में खुद के जख्म को,
खुद ही मरहम भर कर हर बार सिया मैने।

रुला के तुमको खुद रो दिया मै।

Friday, December 2, 2011

मेरे जन्मदिन के दिन "काव्य संग्रह" का विमोचन........[आशीर्वाद दे]

सर्वप्रथम मै सत्यम शिवम अपने सभी साहित्य प्रेमीयों का अभिनंदन करता हूँ।आज मेरी जिंदगी के दो महत्वपूर्ण दिन है।एक तो आज मेरा "जन्मदिवस" है दूसरा आपसबों के आशीर्वाद से मेरे सम्पादन में प्रकाशित काव्य संग्रह "टूटते सितारों की उड़ान" का विमोचन।

सब आपसबों के आशीर्वाद और स्नेह से सम्भव हुआ है।हमेशा आप मेरी कविताओं और आलेखों पर अपने विचार रखकर उसे सही मार्गदर्शन देते है।यह मेरे लिये सौभाग्य की बात है।

आज आप सभी श्रेष्ठजनों से आशीर्वाद की इच्छा है।

"साहित्य प्रेमी संघ" के त्तत्वावधान में प्रकाशित काव्य संग्रह "टूटते सितारों की उड़ान".....20 भावप्रधान कवियों की काव्य माधुरियों से सुशोभित.....एक अनोखा काव्य संग्रह...जिसमें आपको हर रस और रंग की 166 कवितायें एक साथ पढ़ने का मौका मिलेगा...और साथ ही इन कवियों से रुबरु होने का भी मौका मिलेगा....यह एक अनोखी उड़ान है साहित्याकाश में...."टूटते सितारों की उड़ान".......[यह काव्य संग्रह अब आपको प्राप्त हो सकती है.....इस काव्य संग्रह की अग्रिम बुकिंग कराने के लिये और अपनी प्रति सुनिश्चित कराने के लिए आज ही हमे मेल से सम्पर्क करे at contact@sahityapremisangh.com या इस नम्बर पर सूचित करे (9934405997)....."अग्रिम बुकिंग कराने पर पुस्तक रिबेटिंग कीमत पर प्राप्त हो सकेगी".........धन्यवाद]
ISBN 
(978-81-921666-4-3)

पुस्तक का प्रोमो विडियों आप देख सकते है यहाँ...

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Friday, November 11, 2011

मै कौन हूँ

मै मानव हूँ,या दानव हूँ,
प्रकाश हूँ,या अंधकार हूँ।
कोई संगीत हूँ,या कोई शोर हूँ,
न जाने किसका मै छोर हूँ?

दिन हूँ,या रात हूँ,
शब्द हूँ,या बात हूँ।

इस प्रश्न पर आज क्यों मौन हूँ,
न जाने मै कौन हूँ?

मै कौन हूँ,मै कौन हूँ?

भोर की मधुबेला हूँ,शाम की गोधुली वेला हूँ,
दुनिया के भीड़ में भी,
न जाने क्यों,
मै तो बस आज अकेला हूँ।

सूरज की पहली किरण हूँ,
या सूर्यास्त की लालिमा हूँ।

दिन का ऊजाला हूँ,या रात की कालिमा हूँ।

इस प्रश्न पर आज क्यों मौन हूँ,
न जाने मै कौन हूँ?

मै कौन हूँ,मै कौन हूँ?
मै फूल हूँ,या शूल हूँ,
मिट्टी हूँ मै या धूल हूँ।

इक बीज हूँ,या वृक्ष हूँ,
सुदूर हूँ या समक्ष हूँ।

मै डाली हूँ,या तना हूँ,
किस रँग‍रुप में मै सना हूँ।

मै इक फूल हूँ,या पूरा बाग हूँ,
इक हँस हूँ,या मै काग हूँ।

इस प्रश्न पर आज क्यों मौन हूँ,
न जाने मै कौन हूँ?

मै कौन हूँ,मै कौन हूँ?

इक धारा हूँ,या नदी हूँ,
सागर हूँ,युग हूँ,मै सदी हूँ।

इक आत्मा हूँ,या परमात्मा हूँ,
सगुण हूँ,या निर्गुण हूँ।

इक ख्वाब हूँ,या सत्य हूँ,
जीवित हूँ मै या मृत हूँ।

मनमीत हूँ,मनचोर हूँ,
अलगाव हूँ,या जोड़ हूँ।

इस प्रश्न पर आज क्यों मौन हूँ,
न जाने मै कौन हूँ?

मै कौन हूँ,मै कौन हूँ?

दुर्बल हूँ मै या सर्वशक्तिमान हूँ,
इक सत्य से अनजान हूँ।

मै ज्ञान हूँ,विज्ञान हूँ,
मुर्ख हूँ मै अज्ञान हूँ।
समझदार हूँ या नादान हूँ,
सम्मान हूँ,या अपमान हूँ।

आदि हूँ मै या अंत हूँ,
कब से हूँ मै,जब से हूँ मै।

इस प्रश्न पर आज क्यों मौन हूँ,
न जाने मै कौन हूँ?

मै कौन हूँ,मै कौन हूँ?

मै गगन हूँ,अंतरिक्ष हूँ,
मँजिल हूँ मै ,मै ही लक्ष्य हूँ।

इक तारा हूँ,या चाँद हूँ,
मै एक हूँ,या अनेक हूँ।

नारी हूँ मै या पुरुष हूँ,
ममता हूँ मै,मै ही प्रेम हूँ।

आँख हूँ या आँखों का काजल हूँ,
आँसू की हर बूँद का इक जल हूँ।

इक क्षण हूँ,इक पल हूँ,
निर्बल हूँ,या सबल हूँ।

इस प्रश्न पर आज क्यों मौन हूँ,
न जाने मै कौन हूँ?

मै कौन हूँ,मै कौन हूँ?

मै शिशु हूँ,या पिता हूँ,
बच्चा हूँ,या माता हूँ।

जग हूँ मै संसार हूँ,
जीत हूँ या हार हूँ।

सृजन हूँ मै संहार हूँ,
घृणा हूँ या मै प्यार हूँ।

मै भाव हूँ,या अभाव हूँ।

इस प्रश्न पर आज क्यों मौन हूँ,
न जाने मै कौन हूँ?
मै कौन हूँ,मै कौन हूँ?

मै प्रश्न हूँ,या हल हूँ,
मै आज हूँ,या कल हूँ।

मै भूत हूँ,या भविष्य हूँ,
अज्ञात हूँ,या दृश्य हूँ।

मै देश हूँ,मै ही वेश हूँ,
माहौल हूँ मै परिवेश हूँ।

जो हूँ मै वही हूँ क्या,
या सब कुछ है जगत में मिथ्या।

इस प्रश्न पर आज क्यों मौन हूँ,
न जाने मै कौन हूँ?

मै कौन हूँ,मै कौन हूँ?

मै तुझमे हूँ,मै खुद में हूँ,
क्यों मै हूँ,तुम क्यों ना हूँ?

इक क्षण में हूँ,इक पल में हूँ,
मै तो अनंत युग और सदियों में हूँ।

ब्रह्मांड हूँ,इक प्राण हूँ,
शांति हूँ,स्नेह हूँ,निर्वाण हूँ।

अनुभव हूँ मै,अनुमान हूँ,
हर जीव की इक पहचान हूँ।

सम्पूर्ण हूँ मै,आत्मज्ञान हूँ,
ईश्वर हूँ मै,मै ही भगवान हूँ।

इस प्रश्न पर आज क्यों मौन हूँ,
न जाने मै कौन हूँ?

मै कौन हूँ,मै कौन हूँ?

Saturday, October 29, 2011

मेरे बाद......

कुछ घड़ी बस स्नेह की बहती नदी में,
ज्वार भावों का उठेगा और गिरेगा,
मेरे पद्चिन्हों पे चल कर तम की नगरी,
सूर्य कोटि रश्मियों से भी लड़ेगा।
आँसू के कुछ धार बहते नैन तल से,
होंठों का स्पर्श कर सिहरन करेंगे,
याद कर के खामियों और खूबियों को,
लोग मुझको देवता,दानव कहेंगे।

याद होगी,बात होगी,मेरी कुछ रचनायें होगी,
पर न जाने उस जहाँ में मौन मै कैसा रहूँगा?

मेरे बाद,मेरे बाद.................।

चाहता था जो मै करना कर सका ना,
वक्त की आँधी से लड़ कर बह सका ना।

मैने ढ़ाला स्वयं को उन्मुक्त कर के,
पर जमाना चाहा जैसा कर सका ना।

कुछ घड़ी हर साँस तुम पर कर न्योछावर,
मैने मन के,तन के तार तुमसे जोड़े,
हर दशा में जो दिशा विपरीत तुमसे,
एक क्षण में साथ उन राहों का छोड़े।

पर न जाने आज तुमसे दूर होकर,
इस जहाँ में मै अकेला कैसा रहूँगा?

मेरे बाद,मेरे बाद....................।

कौन है जो समय पर बदला नहीं है,
कौन है जो मौत से डरता नहीं है,
है स्वरुप भिन्न,भिन्न छटायें कुछ नयी सी,
कौन ठोकर खा के उठकर चलता नहीं है।

आज गर है नाम तेरा,दाम तेरा,
कल तेरे राहों में छायेगा अँधेरा,
लाख चाहे रोकना इंसान खुद को,
मिट्टी का तन,मिट्टी में डाले बसेरा।

पर तुम्हारे कदमों की इक धूल बनकर,
उड़ता,उड़ता बस यहाँ से मै वहाँ तक।
नाम के बिन बस बना बेनाम आशिक,
होकर भी ना होने सा कैसा रहूँगा?

मेरे बाद,मेरे बाद.................।

मेरे परिजन,संग साथी और संगाती,
जन्म के उल्लास से मरघट के साथी,
मेरे पिछे आँसू अपने पोंछते है,
क्यों गया ये दूर ऐसा सोचते है।

मौत की शैय्या बिछी है मै पड़ा हूँ,
आत्मा बन सामने सब के खड़ा हूँ,
देखता हूँ सामने है दृश्य न्यारा,
जिंदगी की दौड़ में कोई है हारा।

पर ज्यों ही हाथों को बढ़ाकर छुना चाहूँ,
स्वप्न से मानो भयंकर जाग जाऊँ,
दूर है अब दूरियों में प्यार सिमटा,
पर तुम्हारे बिन मै मर भी न सकूँगा।

मेरे बाद,मेरे बाद...................।

Monday, September 19, 2011

अरसों के बाद घोंसलों में......

बड़े दिनों बाद घर जाना हो रहा है...तो कुछ पंक्तियाँ इस बार के जाने पर आ रही है "बड़े वक्त के बाद फिर शहर में,हुआ है आना मेरा"...कहते है ना कवि किसी भी विषयवस्तु को कुछ अलग तरीके से सोच लेता है...तो देखिये मेरी इस सोच का नतीजा........ये पंक्तियाँ बयाँ हुई कुछ इस अंदाज में....

अरसों के बाद घोंसलों में,
पंछी ने डाला है बसेरा।
कैसे बताऊँ था कितना सूना,
तुझ बिन ये जीवन मेरा।

कुछ नहीं बदला यहाँ पर,
रेत भी है,चट्टान भी है,
और दीवारों के कान भी है।

वही कंकड़ है,सड़क है,
रास्ते है अभी भी सूने सूने,
उन रास्तों पे चलते हम तुम,
कई ख्वाबों को थे कभी बुने।

दो कदम बस और मुझको चलना है,
लगता है अब दूर नहीं घर मेरा।

अरसों के बाद घोंसलों में,
पंक्षी ने डाला है बसेरा।

वो नीड़ अब भी है उसी का,
वो जानता है।

मौसम की बेरुख अदाओं को,
पहचानता है।

है याद उसके कल के कही इन घोंसलों में,
बेफिक्र रात के बाद जहाँ होता सवेरा।

अरसों के बाद घोंसलों में,
पंछी ने डाला है बसेरा।

गुम हो गयी अतीत की सारी कहानी,
मिट गयी है इस पेड़ से मेरी निशानी।
कई बार उल्टा रुख हवा का,
उड़ गये परिंदे,
बारिश की बूँदों में समाये से दरिंदे।

तन भीग जाता,भीग जाता है मेरा मन,
आँखों से बरसे बूँद बन प्रवास मेरा।

अरसों के बाद घोंसलों में,
पंछी ने डाला है बसेरा।

Thursday, September 15, 2011

इंजीनियर्स की परेशानी (प्रेम डगर)


आज से एक वर्ष पहले मैने "इंजीनियर्स डे" के मौके पर ही लिखा था अपना एक लोकप्रिय काव्य "इंजीनियर्स की परेशानी"....जिसमें बताया गया था इंजीनियर्स की लाइफ में आने वाली परेशानीयों के बारे में...जो इक इंजीनियर कवि बखूबी समझ सकता है....और आज आप सब के समक्ष मै लेकर आया हूँ "इंजीनियर्स की परेशानी (प्रेम डगर)"..जो बताता है कि प्रेम मार्ग में चलते हुये एक इंजीनियर के साथ क्या क्या परेशानीयां आती है और कैसी भावनाओं से रुबरु होता है वो.....

पहला भाग यहाँ पढ़े....

इंजीनियर्स की परेशानी (प्रेम डगर)
होती थी बरखा,बहार कभी,
पतझड़ की सी सुखार कभी,
मन ही मन की वो बेचैनी,
कहलाती थी जब प्यार कभी।
तब आँखों में आँसू की जगह,
सैलाब उमड़ता था,
मै डूबता था कभी कही,
और कभी उभरता था.............।

नये प्यार सा नया सेमेस्टर,
लूज़ करता रहा मेरा कैरेक्टर,

बी.ई. फिल्म की चार रील की मूवी में,
बन गया मै अब सपोर्टिंग एक्टर।

तब मैने जाना कि,
ये प्यार तो है बस मेरी नादानी।

कहता हूँ मै एक ऐसी कहानी,
इंजीनियर्स की परेशानी,
एक इंजीनियर की जुबानी।

कई बार हुआ था प्यार मुझे,
कुछ बार किया इकरार मगर,
दो कदम चला तब ये जाना,
मुश्किल है बड़ी ये प्रेम डगर।
कभी सोचा बंद लिफाफों में दिल की बातें कह डालूँगा,
मन ही मन में फिर आज तुम्हें कैसे भी मै तो पा लूँगा।

पर याद नहीं वो सावन मुझको,
जो अंदर तक कही भिगो गया,
दिल की बातें दिल में रह गयी,
कर ना पाया मै उसे बयां।

कुछ रात यूँही नींद बिन गुजरी,
कुछ रात अजब हलचल सी थी,
कुछ रात तुम्हारी यादों में,
सौ बरस के जैसी दो पल भी थी।

मै जाग गया जो भोर हुआ,
रात का सपना पल में टूटा,
इक रात प्यार का खेल,खेल,
समझा ये प्यार है बड़ा झूठा।
यूँ व्यर्थ नहीं अब करनी है,
मस्ती से भरी अपनी जवानी,
ये प्यार,मोहब्बत बेमतलब,
बस है इससे हमको तो हानि।

कहता हूँ मै एक ऐसी कहानी,
इंजीनियर्स की परेशानी,
एक इंजीनियर की जुबानी।

"HAPPY ENGINEER'S DAY TO ALL OF U"

Monday, September 12, 2011

साहसी है कौन?

साहसी है कौन वह जो,
लक्ष्य पर बढ़ता ही जाये।
जीत का इक गीत बुनकर,
कदमों में दुनिया झुकाये।

जिसकी धमनियों में बहता हो,
अटल का रक्त घुलकर,
श्वास भी  चलती हो ऐसे,
जैसे चल रहा हो नभ दल।

तेज से जगमग जलाता,
रौशनी सा वह सफर में,
धैर्य से कर मित्रता,
निभाता हर पल नव डगर में।

हौसला इतना बड़ा कि,
आसमां के पार हो ले,
हाथ पे लकीर खींचे,
खुद किस्मत का ताला खोले।

झुकते जिसके सामने,
पर्वत और अम्बर के सितारे,
देख कर प्रकाश जिसका,
सूर्य का भी तेज हारे।
पर नहीं अभिमान थोड़ा,
बढ़ गया जो लक्ष्य तेरा,
मँजिल तक पहुँचे बिना,
अब तो ना इक पल थकान आये।

साहसी है कौन वह जो,
लक्ष्य पर बढ़ता ही जाये।

Monday, September 5, 2011

अब तक ना भूला....

"समय दर समय बदलते जिंदगी के रुप अनेक,
और भावनाओं मे बहती जीवन की कस्ती....."

अब तक का हर जज्बात,
बचपन का हर इक साथ,
माँ की प्यारी सी डाँट,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!
नये दोस्तों से रोज मुलाकात,
क्लास में ही करना खूब सारी बात,
टीचर की हमलोगों को डाँट,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!

भोर की पहली किरण का आगमन,
अल्साई धुन पर मंदिर का भजन,
खेल के लिए दोस्तों का निमंत्रण,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!

पेट में पैदा हुयी वो जोरो की भूख,
माँ के हाथ से इक कौर का सुख,
कल सुबह फिर से स्कूल जाने का दुख,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!
शाम को भाई के साथ बैठ पढ़ना,
लैम्प की रौशनी में पहाड़े रटना,
बड़ों की महफिल से दूर हटना,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!

पापा के कँधे पर बैठ दुनिया देखना,
माँ की आँचल में सो नन्हें ख्वाब समेटना,
भाई के साथ अपने-अपने खिलौने सहेजना,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!

पहले प्यार का वो सुहाना असर,
नए ख्वाबों में हर रोज का सफर,
कैसे मिल जाती है पल में नजर से नजर,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!
मोहब्बत में जमाने को भूल जाना,
दिन-रात ना कुछ पीना ना खाना,
एक यही रट तुझको है पाना,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!

पापा की मुझको कड़ी फटकार,
माँ का फिर भी वो ही दुलार,
बदल रहा था मेरा घर-संसार,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!

जिंदगी की हरदम भाग-दौड़,
ट्रैफिक का गूंजता कानों में शोर,
आपाधापी में आगे बढ़ने की होड़,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!

बन गया खुद का ही मेरा परिवार,
बसा लिया इक नया घर संसार,
पर माँ-बाप का वो प्यार,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!

बाल-बच्चों का मुझपर झपटना,
पत्नी का हरपल डपटना,
जिंदगी से चुपके से मेरा कटना,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!

माँ-बाप की अंतिम विदाई,
भाई से हो गई मेरी जुदाई,
जिंदगी ने कैसी यह दशा दिखाई,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!
शरीर में उपजा वो लाइलाज रोग,
दुनिया से जगा इक रोज जोग,
पैदा हुआ अद्भूत संजोग,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!

धड़कन से निकलती आखिरी साँस,
परिवार वालों के मेरे प्रति जज्बात,
जिंदगी से मेरी आखिरी बात,
मौत से चुपके से मुलाकात,
सिमटती और रुकती मेरी हर साँस,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!

Saturday, September 3, 2011

भरे है नीर से लोचन

भरे है नीर से लोचन,
कोई तो हो इन्हें पोंछे।
बिना भावों के बोझिल मन,
करे अब क्या,किसे सोचे?

वही है दूर से आना,
कही फिर दूर तक जाना,
जुड़े जो डोर तुमसे ना,
उसे फिर कोई क्यों खींचे?

भरे है नीर से लोचन,
कोई तो हो इन्हें पोंछे।

कोई सागर समाया है,
मेरे मन में उठा तूफान,
विरह के रेत के बिना,
सूना है ह्रदय का रेगिस्तान।

उड़ा कर ले गयी हवा,
जिन गुजरे लम्हों के निशा,
दौड़ा-दौड़ा अब थक गया मै,
चलते-चलते उनके पीछे।

भरे है नीर से लोचन,
कोई तो हो इन्हें पोंछे।

ख्यालों में सजाता हूँ,
परस्पर नेह की इमारत,
मिले बिछुड़ा हुआ कोई,
यही करता हूँ इबादत।

मगर जब टूट कर सारे,
बिखर जाते है मेरे ख्वाब,
जाग जाता हूँ तब ही मै,
चुपचाप आँखों को मींचे।

भरे है नीर से लोचन,
कोई तो हो इन्हें पोंछे।

Tuesday, August 30, 2011

अजान का वो स्वर सूना है

मस्जिद में लगे ध्वनि-विस्तारक यंत्रों से,
अजान का वो स्वर सूना है!
नमाजों में,दुआओं में,
मुसलमानों के पाक इरादों में,
दिख जाता मुझे आज भी वो खुदा है!

खुदा ना जुदा है बंदो से,
बंदगी उसकी अब भी वही है,
मजहब वही है,खुदा वही है,
इंसानियत ही आज सूना-सूना है!

मस्जिद में लगे ध्वनि-विस्तारक यंत्रों से,
अजान का वो स्वर सूना है!

खिदमत में खुदा की पेश करुँ,
मै आज कहाँ से गुजरा जमाना,
वो प्यार,मोहब्बत,
वो इबादत का दस्तूर,
भुला दिया है अब तो आना-जाना!

जमाने उल्फत को अब ताक पर रख,
उस पाक दिल को तो आज छुना है!

मस्जिद में लगे ध्वनि-विस्तारक यंत्रों से,
अजान का वो स्वर सूना है!
Photobucket
भाईचारा,बद्सलूकी का हमराही हुआ,
अलविदा कहा उस कौम को,
खुदा भी ताकता रहा बंदो को,
इशारा दिया जुबा को मौन से!

वो ईद की तैयारी,
वो प्यार से गले मिलना,
इक अलग ही खुमार होता था,
रोजा रखना,नमाज पढ़ना,
हर घर में कभी मैने सुना है!

मस्जिद में लगे ध्वनि-विस्तारक यंत्रों से,
अजान का वो स्वर सूना है!

पर आज कहाँ वो रमजान है,
बकरीद की कुर्बानी,
से भी सब अंजान है,
तभी तो मै तुमसे ये कह ही दूँ,
मैने बस उस रब को चुना है!

मस्जिद में लगे ध्वनि-विस्तारक यंत्रों से,
अजान का वो स्वर सूना है!

जन्नत मेरा मक्का-मदीना में,
उस ईद के चाँद पर अटका है,
मैने जिसे देखा तो मन में,
कई ख्वाब मेरे खुद ही बुना है!

मस्जिद में लगे ध्वनि-विस्तारक यंत्रों से,
अजान का वो स्वर सूना है!

भरी दोपहरिया में,बड़ी भोर में,
गोधुली में हर शाम को,
“अल्लाह हो अकबर...“की वो धुन,
बंदे कभी तो दिल से सुन!
ना कौम की चर्चा कही,
ना ही मजहब का वास्ता,
बस है खुदा उन बंदो का,
अपनाते है जो मोहब्बत का रास्ता!

मैने तो जाना मोहब्बत होता बडा़,
आज भी धर्म और मजहब से कई गुना है!

मस्जिद में लगे ध्वनि-विस्तारक यंत्रों से,
अजान का वो स्वर सूना है!

आप सभी को ईद मुबारक.....

Sunday, August 21, 2011

कान्हा,जब तेरी याद आती है....

मेरी आवाज में इस गीत के कुछ अंश....
बिलख,बिलख के,
सिसक,सिसक के,
आँसू बहाती है,
कान्हा,जब तेरी याद आती है।
god hindu mdana gopal radha and krishna
तरस,तरस के,
बरस,बरस के,
पीड़ा भूलाती है,
कान्हा,जब तेरी याद आती है।

रास बिना ये जीवन फीका लगता है,
साँस बिना हर साज अधूरा सजता है।

राह तुम्हारे देख दिन कब रैन हुई,
यमुना तीरे बैठ अकेली गाती है।

कान्हा,जब तेरी याद आती है।

ढ़ूँढ़,ढ़ूँढ़ परेशान हो गयी नैन बेचारी,
आ जाओ नटखट करो फिर लीला न्यारी।

तरस गये ये कर्ण सुनने को मधुर,रसीली,
तेरे मनमोहक मुरली की तान निराली।

दरश दिखा दो कान्हा अब बड़ी देर हुई,
पल-पल बुझती स्नेह लग्न की बाती है।

कान्हा,जब तेरी याद आती है।

प्रियतम मेरे सखा लाज अब रख लो तुम,
मै हूँ सुदामा निर्धनता से हो रहा गुम।

धन,दौलत की चाह नहीं है प्रभु मुझे,
मन को स्वच्छ,स्नेहमय कर दो,
दे दो सच्चा धन।
lord krishna govinda radha and krishna
चुन-चुन कर हर रोज बाग से पुष्प ये राधा,
गूँथ-गूँथ फूलों की माला सजाती है।

कान्हा,जब तेरी याद आती है।

काली,घनघोर तम की बदली छायी है,
दुष्ट कंस के अंत की घड़ी फिर आयी है।

एक कंस अब कलियुग में बस नहीं रहा,
हर इंसान में कंस की काया समायी है।

तोड़ दो रणछोड़ समर का हर प्रपंच,
दुख से पीड़ित भक्तों की टोली बुलाती है।

कान्हा,जब तेरी याद आती है।

"श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ....."

Thursday, August 18, 2011

चल रही है दर्द की कुछ आँधियाँ....

चल रही है दर्द की कुछ आँधियाँ,
और मेरा दर्द भी संग चल रहा।
चोट खाकर राह में अवरोध से,
आह भी संताप संग घुल गल रहा।

दिख रही है सामने परछायी सी,
नैन तट पर तम की बदली छायी सी,

मिल रहा है भ्रम का साया नया,
लग रहा है झूठा नभ और जहाँ।

खो रही है हाथ की लकीरें,
बुझ रहा है मन दीप धीरे धीरे।

लौ से ही तो आज रौशन,
चाहतों का ये दीया।

चल रही है दर्द की कुछ आँधियाँ,
और मेरा दर्द भी संग चल रहा।

दूर जैसे गा रही है गायिका,
पास अपने बुला रही है नायिका,
सोचता हूँ क्या करुँ,क्या ना करुँ?
बूँद बिन सावन भी तो है फीका।

छोड़ दूँ मै या खुद को सौंप दूँ,
हाथ उनके जो है मद की प्यालियाँ,
या लगा लूँ होंठ से मै फिर उन्हें,
डूब कर मैने है सब कुछ पा लिया।

चल रही है दर्द की कुछ आँधियाँ,
और मेरा दर्द भी संग चल रहा।

टीस है खुद में कि तुमको देख लूँ,
आखिरी जो क्षण है जीवन का मिला,
प्यार दे दूँ इस कदर फिर से तुम्हें,
भूल जाओ बीता हुआ शिकवा गिला।

यूँ लगा लूँ आज मै अपने गले,
स्नेह का उर से हो उर में मिलन,
दो घड़ी बस संग तेरे आज मै,
सौ जन्म से भी है ज्यादा जिया।
चल रही है दर्द की कुछ आँधियाँ,
और मेरा दर्द भी संग चल रहा।

याद के उस शून्य पर है आज भी,
प्यार का अपना सितारा टूटता,
माँगता हूँ फिर से वो तमाम रात,
दर्द का ये किस्सा पल पल छूटता।

अब नहीं चाहूँ जहाँ की उर्मिया,
और ना ही राह में प्रकाश का दीया,
माँगता हूँ मै तो बस अपने खुदा से,
लौटा दे वो पल जिसे तूने लिया।

चल रही है दर्द की कुछ आँधियाँ,
और मेरा दर्द भी संग चल रहा।

Tuesday, August 16, 2011

मृत्यु-पीड़ा

उर की व्यथा उर में रह गयी,
हर संताप तिमिर में घुल गयी।
श्वेत अश्व का धावक आया,
आत्मा,परमात्मा से मिल गयी।

अदृश्य लकीरें अनहोनी की,
तन के आद्यांग में फूटी,
तन हुआ जहान से वैरागी,
आत्मा जो तन से है रुठी।

सारे क्षण यूँ थम गये,
आँखों में आँसू जम गये।

हर ख्वाहिश रह गयी अब अधूरी,
जहान से बढ़ गयी मेरी दूरी।

तन की थी ये व्यापक मजबूरी,
मृत्यु है क्यों इतनी बुरी?

सहमें से सारे मंजर मेरे,
जुदाई का वियोग है मुझको घेरे।

अपने साथी अब छूट गये,
हर ख्वाब अधूरे टूट गये।

कविता भी मेरी थी अधूरी,
अँधेरी रातों में चमकती फुलझड़ी,
लगती थी दुनिया कितनी सिंदूरी,
हुई ना मेरी इक माँग भी पूरी।

चाहतों का दीया बूझ गया,
नभ से इक सितारा टूट गया।

श्वास का दीपक जो बुझा,
जिंदगी हो गई बस जुदा जुदा।

जीवन से जो मै रुठा,
पाया जग तो था झूठा।

जिसके लिये था मै सब कुछ,
मेरे बाद भी तो है वो खुश।

मेरी कहानी का हो गया अंत,
राही था अब मै उन राहों का,
मँजिल था जिनका बस अनंत।

बढ़ गया बेहिचक प्राण सा मै,
दुनिया से बिल्कुल अंजान सा मै।
ठोकर जो मिली तो ठहर गया,
सुख दुख का सारा पहर गया।

पीड़ा थी कितनी उर में भरी,
खत्म हुई जीवन की कड़ी।

पाया मैने वो सच्चा ज्ञान,
कब से था जिससे मै अंजान।

प्रकाश की नई परिभाषा,
आत्मा को मिली जो इक आशा।

तन को चुपके से सुला दिया,
मृत्यु पीड़ा को भूला दिया।