Monday, September 5, 2011

अब तक ना भूला....

"समय दर समय बदलते जिंदगी के रुप अनेक,
और भावनाओं मे बहती जीवन की कस्ती....."

अब तक का हर जज्बात,
बचपन का हर इक साथ,
माँ की प्यारी सी डाँट,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!
नये दोस्तों से रोज मुलाकात,
क्लास में ही करना खूब सारी बात,
टीचर की हमलोगों को डाँट,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!

भोर की पहली किरण का आगमन,
अल्साई धुन पर मंदिर का भजन,
खेल के लिए दोस्तों का निमंत्रण,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!

पेट में पैदा हुयी वो जोरो की भूख,
माँ के हाथ से इक कौर का सुख,
कल सुबह फिर से स्कूल जाने का दुख,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!
शाम को भाई के साथ बैठ पढ़ना,
लैम्प की रौशनी में पहाड़े रटना,
बड़ों की महफिल से दूर हटना,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!

पापा के कँधे पर बैठ दुनिया देखना,
माँ की आँचल में सो नन्हें ख्वाब समेटना,
भाई के साथ अपने-अपने खिलौने सहेजना,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!

पहले प्यार का वो सुहाना असर,
नए ख्वाबों में हर रोज का सफर,
कैसे मिल जाती है पल में नजर से नजर,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!
मोहब्बत में जमाने को भूल जाना,
दिन-रात ना कुछ पीना ना खाना,
एक यही रट तुझको है पाना,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!

पापा की मुझको कड़ी फटकार,
माँ का फिर भी वो ही दुलार,
बदल रहा था मेरा घर-संसार,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!

जिंदगी की हरदम भाग-दौड़,
ट्रैफिक का गूंजता कानों में शोर,
आपाधापी में आगे बढ़ने की होड़,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!

बन गया खुद का ही मेरा परिवार,
बसा लिया इक नया घर संसार,
पर माँ-बाप का वो प्यार,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!

बाल-बच्चों का मुझपर झपटना,
पत्नी का हरपल डपटना,
जिंदगी से चुपके से मेरा कटना,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!

माँ-बाप की अंतिम विदाई,
भाई से हो गई मेरी जुदाई,
जिंदगी ने कैसी यह दशा दिखाई,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!
शरीर में उपजा वो लाइलाज रोग,
दुनिया से जगा इक रोज जोग,
पैदा हुआ अद्भूत संजोग,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!

धड़कन से निकलती आखिरी साँस,
परिवार वालों के मेरे प्रति जज्बात,
जिंदगी से मेरी आखिरी बात,
मौत से चुपके से मुलाकात,
सिमटती और रुकती मेरी हर साँस,
बस इक यही बात,
अब तक ना भूला!

17 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

कुछ बातें कहाँ भूलती हैं।

वन्दना said...

पूरी जीवन यात्रा करा दी।

sushma 'आहुति' said...

बहुत ही अच्छी रचना...

रचना दीक्षित said...

कुछ बातें न तो भूल पातें हैं और न ही भूलने का दिल होता है

Nitesh Jha said...

is rachna se har kisi ko apna pura jeevan kaal anko me ghoom jayega..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।
--
शिक्षक दिवस की शुभकामनाएँ!

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत सुन्दर...बधाई

Maheshwari kaneri said...

बचपन कभी भूलाया नहीं जासकता.उसकी मीठी यादे ं हमारे रोम रोम में बसी होती हैं..सुन्दर अभिव्यक्ति.....

रेखा said...

बचपन की कुछ बातें हमेशा याद आती ही है ...

Udan Tashtari said...

शायद ही कभी भूल पायें...उम्दा रचना.

Patali-The-Village said...

बहुत ही अच्छी रचना| बचपन की कुछ बातें हमेशा याद आती ही है|

संजय भास्कर said...

सुन्दर प्रस्तुति...दिल को छू गई.

prerna argal said...

bahut sunder dil ko choonewaali prastuti.bahut bahut badhaai aapko.

Dr (Miss) Sharad Singh said...

आन्तरिक भावों के सहज प्रवाहमय सुन्दर रचना....

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सुन्दर भावों को संजोया है .. कुछ बातें हैं जो कभी नहीं भुलाई जा सकतीं ...अच्छी प्रस्तुति

prerna argal said...

आपकी पोस्ट आज "ब्लोगर्स मीट वीकली" के मंच पर प्रस्तुत की गई है /आप आयें और अपने विचारों से हमें अवगत कराएँ /आप हमेशा ऐसे ही अच्छी और ज्ञान से भरपूर रचनाएँ लिखते रहें यही कामना है /आप ब्लोगर्स मीट वीकली (८)के मंच पर सादर आमंत्रित हैं /जरुर पधारें /

JHAROKHA said...

aapke blog ka samarthan kaise karun kripya bataiye.
dhanyvaad sahit poonam