Thursday, December 30, 2010

दर्पण से परिचय

आज मुझसे पूँछ बैठा,
दर्पण ने ही मेरा परिचय,
कहने लगा मै जानता हूँ,
उम्र का जो फासला किया तुने तय।

मेरे नयन में तेरी छवि,
है बसी बड़ी पुरानी,
दर्पण को परिचय देना,
तो है तेरी नादानी।

तेरे नन्हे हाथ, नन्ही आँखों के,
हर ख्वाब को देखा मैने करीब,

बनते सँवरते और बिगड़ते,
वक्त के थपेड़ों पे तेरा नसीब।

तेरे वजूद का निर्माण देखा,
तेरे अरमानों का अवसान देखा,

देखा है मैने उम्र दर उम्र,
तेरी हथेली की बदलती रेखा।

तसवीर तुम्हारे बचपन के,
मस्ती का और जवानी का,

हर वो मंजर था जो आया,
जिंदगी की अल्हड़ मनमानी का।

पढ़ता रहा तेरे चेहरे को,
और तु बिन बताए सब बोल गया,

दर्पण से तु दूर रहा पर,
खुद असलियत अपनी खोल गया।

गमों के वक्त में तेरा हमराज मै,
दुनिया से दूर छुपा तेरा राज मै।

कहा तुने मुझसे दर्द दिल का,
और दिखाया जख्म अपने,
मैने किया उपचार जो,
मरहम बन गए तेरे अधूरे सपने।

आँखों में देखा जो तु इक बार,
विश्वास बढ़ा तेरा हर बार।

आज खुद को पहचान कर ही,
कैसे किया तुने,
दर्पण के परिचय से इंकार।

दुनिया को होगी जरुरत,
तेरे पहचान की,
दर्पण से परिचय तो है,
ठेस मेरे सम्मान की।

तेरा और मेरा तो,
साया और तन सा साथ है,

दोनों में हो कोई पहचान,
परिचय को,
बताओ ये कैसी बात है.......।

Thursday, December 23, 2010

सांता क्लाज की काया

इस क्रिसमस पर फिर याद आया,
इक धुँधला धुँधला सा साया।

यादों की जुबानी, बचपन की कहानी,
उपहार लिये वो आता,
चाक्लेट्स, मिठाईयाँ देता सबको,
बस प्यार ही प्यार लुटाता,
बच्चों के मन को भाता।
लाल कमीज, सफेद दाढ़ी वाले,
सांता क्लाज की काया।

इस क्रिसमस पर फिर याद आया,
इक धुँधला धुँधला सा साया।

सांता क्लाज हम सब का प्यारा,
रुप उसका मनभावन न्यारा,

माथे पे वो हाथ फेरता,
सपनों में भी हमको छेरता,
जादुई सी लगती उसकी जादुई माया।

इस क्रिसमस पर फिर याद आया,
इक धुँधला धुँधला सा साया।

बड़े दिन की बड़ी बड़ी खुशियों से,
जब ये दिल भर जाता,
फिर से होता रात ख्वाब में,
फिर वो ही दिख जाता।

उसके साथ मै घुमू घर घर,
क्रिसमस ट्री पे चढ़ जाता,
सुबह होती माँ मुझको जगाती,
पेड़ से मै गिर जाता।

हर रोज की तरह आज सुबह भी,
माँ ने मुझे जगाया।

इस क्रिसमस पर फिर याद आया,
इक धुँधला धुँधला सा साया।

लम्बी दाढ़ी, लम्बी टोपी,
भारी भरकम गठरी,
खिलौनो और उपहारों से आज,
सज जायेगी सारी नगरी।

क्रिसमस का उपहार लिए,
जब सांता क्लाज आएँगे,
इक मदारी की भाँति वो,
सब बच्चों को नचाएँगे।

इस क्रिसमस भी बच्चों के सपनों में,
फिर सांता क्लाज आया।

इस क्रिसमस पर फिर याद आया,
इक धुँधला धुँधला सा साया।


लाल कमीजसफेद दाढ़ी वाले,
सांता क्लाज की काया।

Thursday, December 16, 2010

प्रभु तुमको तो आकर

अश्रु से सींचि, ह्रदय फूल की,
माला गूँथ मै लाया हूँ।

श्रद्धा के धागों में पिरोकर,
भक्ति उपहार बनाया हूँ।
आज प्रभु तुमको तो आकर,
करना होगा माला स्वीकार,
वरना निर्धन भक्त तुम्हारा,
सह ना पायेगा उर का ये विकार।

पोटली के बचे अनाज के दानों से,
कुछ चावल चुन मै लाया हूँ।

दूध और चिनी मिलाकर,
खीर का प्रसाद बनाया हूँ।

आज प्रभु तुमको तो आकर,
खाना होगा मेरी हाथों से,
अब काम नहीं चलता प्रभु,
सपनों की तुम्हारी बातों से।

निर्धनता ही है मेरा आभूषण,
जैसा तुमने दिया मुझको जीवन।

विपन्नता ना झलकने दूँगा,
मै हूँ भक्त तेरा स्वाभिमानी मन।

खुद धरती ही है बिछावन मेरा,
तेरे लिए पलंग बिछाया हूँ,
छोटे मोटे, फटे पुराने चादर का,
बिस्तर मै सजाया हूँ।

तुमको ना कोई कष्ट हो प्रभु,
मैने वैसा जतन कर डाला,
तकिया ना मिला तो,
फूलों का कोमल सिरहाना ही सजाया हूँ।

अब भी जो तुम ना आओगे,
मेरी भक्ति को दिलासा दिलाओगे।

मुझे शंका होगा कि प्रभु,
कही दीन की कुटिया तुम्हे ना भाती क्या?
दीनबंधु तु है बस अमीरों का साथी क्या।

मेरे सब्र का टीला अडिग है,
जो ना कभी टूटेगा प्रभु।

मै जानता तुम ना हो समक्ष,
तुम्हे देखने को ताकता मेरा अक्ष।

इतना तो प्रभु मै जानता,
तेरी भक्ति को पहचानता,
मेरे ह्रदय में करते हो बास,
टुटेगा ना कभी मेरा ये आश।

जब सारे जतन होंगे विफल,
पुकारुँगा रोज, ना आओगे कल,
ह्रदय ही अपना निकाल दूँगा,
सूरत तो तेरी निहार लूँगा।

मेरे सारे ख्वाब अब होंगे सच,
तुम होगे समक्ष, देख लेंगे ये अक्ष।

पहले माला पहनाऊँगा,
फिर खीर भी खिलाऊँगा,
जो निंद आयेगी तुमको प्रभु,
बिस्तर पे भी सुलाऊँगा।

बस ह्रदय के बिना,
मै थोड़ा सा शांत रहूँगा,
नैन बंद ना होने पाये,
ऐसा कुछ जतन करुँगा।

अपनी माया से बस प्रभु,
धड़कन में कुछ साँस भर देना,
जब शरीर को मेरे निंद जाये,
प्रभु तुम मुझको खबर ये कर देना।

आखिरी झलक तेरी मुझको मिल जायेगी,
मर के भी मेरी आत्मा,
तेरे रुप में खो जायेगी।

तेरी गोद में सो जायेगी......

Wednesday, December 8, 2010

पिता का दुख

कई दिन बीता, कई रात हुई,
बादल उमरे, बरसात हुई।

कितने मौसम यूँ आये गये,
पर बेटे से ना बात हुई।

माँ को भूला था, घर को भूला था,
बेटा शहर में रहता, बिल्कुल अकेला था।
आँगन में खाट पे बाप तुम्हारा,
है बाट जोहता कब से,

आज आओगे, कल आओगे,
जाने आओगे कब घर पे।

सूना है वो डेहरी, तेरे बिन बेटा,
दिन भर जहा तु खेला करता था।

पूछता है मुझसे वो पनघट अब भी,
बेटा जहा से तु रोज गुजरता था।

वो गाँव का मंदिर भी अब तो,
इक शांत, सन्नाटे में गम्भीर है,
कभी जहा पर तेरे भजन की,
गीत सुनाईया देती थी।

वो खेत खलिहान अब ना फलता है,
जहा तेरे नन्हे हाथों ने कभी फसल बोयी थी।

आँगन सुना, पनघट सुना,
सुना है सारा गाँव।

इक तेरे ना होने से,
जीवन में है बड़ा अभाव।

बेमन से माँ काम निपटाती,
रोज तुझको है फोन लगाती।

तुझसे जब ना बात होती,
उदास माँ बहुत है रोती।

कितने वर्ष जो बीत गएँ,
तेरी सूरत देखने को उतावले हम,
कई वसंत बीते, पतझड़ गए,
तेरी राह तकते हुए बावले हम।

हम सब की तो कोई बात नहीं,
पर उसको कैसे भूल गया?

तेरी प्यारी सी नन्ही बहना के,
सारे अरमानों को तोड़ गया।

अकेली, चुपचाप घर के कोणे में,
भईया का राह जोहती है,
ना खाती है ठीक से अब,
ना ही अब वो खेलती है।

छोटी बहन की प्यारी निंदीया,
आ जा तु गाया करता था,
अपनी बहन की खुशियों के लिए,
तु हमसे भी तो लड़ता था।

हर चीज, हर समान,
तेरी याद दिला देते है।

आँखो को रोकता हूँ,
समझाता हूँ,
पर रोज आँसू बहा लेते  है।

चीढ़ होती है, उब गया हूँ मै,
सबको ये समझाता,

क्या करुँ,
अकले में तो मै भी,
मन को ढ़ाँढ़स बँधाता।

तेरे बिन, क्या रात, क्या दिन,
ना बारात, ना त्योहारों के दिन,

सूनसान सन्नाटे से,
पूर्णिमा के रात भी लगते है,
घर का तु दीपक दूर कही,
हम खुद से ही अब कहते है।

लगता है अब तु आयेगा,
मेरे शव को कँधा देने ही,
तेरा बाप जब मर जायेगा,
तुझको तो देख ना पायेगा।

बेटे मेरे, दिल के टुकड़े कह,
माँ छाती से लगा लेती है,
माँ की ममता और प्यार को,
जग को दिखा देती है।

पर इक बाप है कितना मजबूर,
बेटे को गले ना लगा पाता,

मतलब इसका ये तो नहीं,
बाप को नहीं है बेटे से ममता।


विडियो देखे मेरी आवाज में ”पिता का दुख”
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Thursday, December 2, 2010

खोता जीवन हर क्षण

खोता जीवन हर क्षण,
रोता हर पल बस मन।

कुछ प्यारे लम्हे,
कुछ खट्टी मिट्ठी यादें,
कभी लवों से,
मेरे कानों में गुँज जाते।
जब कभी भी कोई पल,
गुजरे जमाने के याद आते।

जीवन के करीब होकर आज,
मै हौले हौले जीवन के सफर से,
खुद को कटता पाता।

बेचारा मन बस पुरानी यादें दुहराता,
हँसता, रोता और खिलखिलाता।

कभी कभी पूँछता खुद से ही,
क्या मै कुछ पा रहा हूँ,
या सब कुछ खो चुका है।

कोई है क्या मेरे साथ,
या सब कुछ बस धोखा है।

इक दीप के प्रकाश सा जीवन उजियारा,
पर बाती तो हर क्षण गल कर,
खुद से ही हारा।

हवाएँ अपने झोंको से,
लौ को हिलाती डुलाती,
फिर भी प्रकाशीत, प्रकाशमान पुंज को,
वो तो बुझा नहीं पाती।

पर समय एक ऐसा क्षण लाता,
जब दीप का अस्तित्व भी मिट जाता।

कल तक जो अरुण था अंधियारी गलियों का,
वो हमेशा के लिए अस्त हो जाता।

कई अपने, सुहाने सपने,
कल थे जो मुझको रचने।

अधूरी कहानीयों की तरह,
किसी पुरानी, जर्जर सी,
पृष्ठों में सिमट जाते।

चाहते हम रोक ले क्षण,
पर खुद ही इक रोज मिट जाते।

कई बार आते, कई बार जाते,
हर बार बस यही तो सभी पाते,

बस कुछ क्षण खुशियों के,
और दुखों का सैलाब,
उमरता मन के किसी कोणे में,
दबी सी, अलसायी सी,
घुटती हुई कोई याद।

आँखों पे सारे मंजर चलचित्र की भाँति,
इक लम्बे अरसे को,
बस दो पल में दिखा देते,
और हम जीवन के बहुत करीब आके,
खुद को हर क्षण,
जीवन से कोशो दूर पाते।

Saturday, November 27, 2010

तुम बिन

तुम बिन तो हम हरपल उदास है,
हर खुशी पास है, पर जाने किसकी आश है।

वो तो लगता है भूला देगी मुझे,
पर मै कैसे कहूँ, कि साँस तो चल रही है,
 लेकिन धडकन उनके पास है।

तुम बिन हर मोर पर तन्हाई है,
महफिल में भी जिंदगी से मिली रुसवाई है।

कमबख्त इश्क भी क्या चीज है,
बिन कहे किसी को दिल दे देता है,
और मिलती है जब प्यास राहों में,
तो दरिया के साथ समंदर भर लेता है।

हर दर्द को दिल में कैद कर,
गम का सैलाब जो बनता है,
आँखे बरसने लगती है,
तुम बिन तो वो कुछ ना करता है।

किनारे पे भी आके मौजे लौट जाती है,
मँजिल के करीब भी आके राही,
रास्ता भूल जाता है।

तुम बिन तूफान आता है, और जाता है,
सदिया आती है, और जाती है,
सब मौसम फलक पे छाती है,
पर दिल से तेरी सूरत कभी ना जाती है।

तुम बिन दिन को रात लिखते है,
अकेले में खुद से ही बात करते है,

पलकों में ख्वाबों का बसेरा होता है,
बस तुम बिन कभी भी ना,
जीवन में सवेरा होता है।

बस तुम बिन, इक तुम बिन, तुम बिन.........

Friday, October 1, 2010

धर्म का नाम

                                                           घृणा ही है क्या धर्म का नाम,
                                                      लड़ना ही है क्या धार्मिकों का काम।

                                                              इंसानियत से दूर बैठा,
                                                      मूर्ति में ही है क्या तेरा भगवान।

                                                    भगवान ना तेरा है,भगावान ना मेरा है,
                                                            बस मन में है राम,रहीम,
                                                            इक सोच का तो फेरा है।

                                                    फिर छिड़ा है आपस में क्यों धर्मयुद्ध,
                                                       बन गया है जो जग में सरेआम।

                                                         इक भावना,इक प्रेम सभी में,
                                                         इंसानियत है सबकी छवि में,
                                                               संवेदना भी एक सा,
                                                             और वेदना भी एक सा,
                                                        फिर जाने क्यों हमने दे दिया,
                                          किसी को हिन्दु और किसी को मुसलिम का नाम।

                                                        घृणा ही है क्या धर्म का नाम,
                                                   लड़ना ही है क्या धार्मिकों का काम।

Sunday, September 26, 2010

क्या यही है प्यार

                                                 मधु अधरों का मोहक रसपान,

                                                    नीर नैन बेजान,निष्प्राण,

                                                  ह्रदय प्राण का उद्वेलीत शव,
                                           मन आँगन में स्नेह प्रेम का कलरव।

                                                    इस जहान में रहकर भी,
                                                घुम आता है उस जहाँ के पार,
                                                        क्या यही है प्यार।

Saturday, September 25, 2010

गंगा की घाटों पे वो

                                                        गंगा की घाटों पे वो फिरता,
                                                        न जाने है कितना अकेला।

                                                         इक बहाव में बह गया वो,
                                                                 आज की शाम,
                                                      जाने कब से निरझर है ये शांत,
                                                  यूगों‍‍‌ यूगों से देखा है जिसने कई सदी।

                                                          शाम की आरती का है समय,
                                                   तनहाईयों ने कर दिया फिर से अकेला।

                                                         गंगा की घाटों पे वो फिरता,
                                                         न जाने है कितना अकेला।

                                                    इक रुकी रुकी सी धुँधली तसवीर,
                                                        दिखती है मूझको गंगा तीर,
                                                        इक नाव अभी भी दिखता है,
                                             किसी की बाट जोहता हुआ बिलकुल अधीर।

                                                         इक प्रार्थना का दीप जलता,
                                                           गंगा की धार में बहता है,
                                                         मेरी भावना के सीप चुनकर,
                                                        कुछ अधूरे ख्वाब को गहता है।

                                                          मेरा मन मुझसे कहता है,
                                                           यादों में जी लेता हूँ फिर,
                                                        गुजरे दिनों की हर इक वेला।

                                                         गंगा की घाटों पे वो फिरता,
                                                         न जाने है कितना अकेला।