Thursday, May 26, 2011

नई दुनिया

कही सुनसान,महफिल विरान,
कही हो रहा बडा़ शोर!
बस भाग-दौड़,बढ़ने की होड़,
स्पर्धा की ईंट से बना,
नई दुनिया का हर मकान!
ये दुनिया इक अजब से,
मुकाम से कराती है सामना,
चाहत है सभी को तो,
बस कामयाबी के ही हाथों को थामना!
बीती घडी़,बीते लोग,
छुट जाती है पुरानी दुनिया,
से बिछुरने का वियोग!

नई दुनिया दिखाती है नये सपने,
छुट जाते है सभी पराये और अपने!
भावनाए बह जाती है मोम सी,
बस वो दीप-लौ उर में समा जाता है!
नई दुनिया देती है इतनी प्रलोभन,
हर भाव और बात भूला जाता है!

सुविधाएँ उपलब्ध होती है,
वो सारी जिसकी इच्छा थी,
चिंता और अशांति करती है पीडी़त,
नई दुनिया लगती है मृगतृष्णा सी!

बढ़ते ही जाते है राही,
मँजिल से भी दूर हो आते है,
इक बार जो मुड़ के देखते है,
खुद को आबादी से दूर पाते है!

चाह के भी लौट ना पाते,
नई दुनिया की रँगरलीयों से,
मिल जाती है नागरिकता नई दुनिया की,
जकड़ जाते है बेड़ियों से!
हर जज्बात,बचपन की बात,
माँ-बाप का साथ,
चैन से गुजरती थी कभी घर में रात,
दिखती थी कभी कोई खिड़की से,
मिल जाती थी बिन माँगे ही हर सौगात,
होती थी घंटो बैठ दोस्तों से बात।

नई दुनिया होती है कितनी जुदा,
भूल जाता है इक भक्त,
अपना भगवान,अपना खुदा!

पैसो की चादर ओढ़ता है,
पैसो की भाषा बोलता है,
बस पैसा-पैसा करता सारी उम्र,
इक कफन भी नसीब ना होता है,
चार कँधे भी ना मिलते है,
जब इक और नई दुनिया से बुलावा आता है!

17 comments:

रश्मि प्रभा... said...

पैसो की चादर ओढ़ता है,पैसो की भाषा बोलता है,बस पैसा-पैसा करता सारी उम्र,इक कफन भी नसीब ना होता है,चार कँधे भी ना मिलते है,जब इक और नई दुनिया से बुलावा आता है!... phir bhi paise ki hi rat lagi hoti hai

kshama said...

Insaan jab khud ko akela pata hai to paise ka nasha door ho jata hai!
Bahut sundar rachana!

Anita said...

यह नई दुनिया है बड़ी कठोर, इससे बच कर रहना ही समझदारी है, जो अपनों से कर दे दूर वह पैसा भी किसी काम का नहीं ...सुंदर भावपूर्ण कविता

prerna argal said...

नई दुनिया दिखाती है नये सपने,छुट जाते है सभी पराये और अपने!भावनाए बह जाती है मोम सी,बस वो दीप-लौ उर में समा जाता है!नई दुनिया देती है इतनी प्रलोभन,हर भाव और बात भूला जाता है!
bahut hi sunder rachanaa jindagi ki hakikat batati hui,badhaai aapko.



please visit my blog and leave the comments also.

प्रवीण पाण्डेय said...

दुनिया आनी जानी है,
सबकी यही कहानी है।

neel said...

sundar rachanaa

संजय भास्कर said...

सोचने को मजबूर करती है आपकी यह रचना ! सादर !

कुश्वंश said...

दुनियां एक अबूझी पहेली रही है हमेशा से , आपने बेहतर समझने का प्रयास किया , काव्य का प्रयाश भी अच्छा है बधाई सत्यम जी

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

पैसो की चादर ओढ़ता है,पैसो की भाषा बोलता है,बस पैसा-पैसा करता सारी उम्र,इक कफन भी नसीब ना होता है,चार कँधे भी ना मिलते है,जब इक और नई दुनिया से बुलावा आता है!

यही होता है इस संसार मे.... उम्दा प्रस्तुति.....

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

यही दुनिया की कहानी है।

---------
हंसते रहो भाई, हंसाने वाला आ गया।
अब क्‍या दोगे प्‍यार की परिभाषा?

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर और सार्थ्क रचना!

DR. ANWER JAMAL said...

Nice.

इंजीनियर साहब, आपका प्यार हमें यहां खींच लाया।
टिप्पणी करें तो क्या करें और आपका शुक्रिया अदा करें तो कैसे करें ?
यही सोच रहे हैं।
मशहूर है कि ‘हाथ के बदले हाथ और जान के बदले जान‘
सो ‘लेख के बदले लेख और लिंक के बदले लिंक‘
तो संभालो लिंक

...तो साहिबान, क़द्रदान लीजिए आज आपके सामने पेश है ‘टिप्पणी के बारे में सबसे बड़ा सच‘

वन्दना said...

पैसो की चादर ओढ़ता है,पैसो की भाषा बोलता है,बस पैसा-पैसा करता सारी उम्र,इक कफन भी नसीब ना होता है,चार कँधे भी ना मिलते है,जब इक और नई दुनिया से बुलावा आता है!

बस इतना ही इंसान नही समझ पाता है और नयी दुनिया के प्रलोभन मे फ़ंसा जाता है………सुन्दर प्रस्तुति।

बाबुषा said...

bahut barhia likha hai satyam.

Kailash C Sharma said...

पैसो की चादर ओढ़ता है,पैसो की भाषा बोलता है,बस पैसा-पैसा करता सारी उम्र,इक कफन भी नसीब ना होता है,चार कँधे भी ना मिलते है,जब इक और नई दुनिया से बुलावा आता है!

....बहुत सार्थक और भावपूर्ण प्रस्तुति..

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

SAMVEDNA SE PARIPOORN RACHNA.
AADHUNIKTA KI ANDHI DAUD ME HAM APNE SANSKARON KO BHOOLTE JA RAHE HAIN .