Wednesday, August 3, 2011

मुझमे ही छुपे हैं वो दोनों रंग

मुझमे ही छुपे हैं वो दोनों रंग,
जिन्हें देख रह गया मै तो दंग।

कभी सामने आकर लुभाते हैं,
कभी चलते हैं मेरे संग संग।
मुझमे ही छुपे हैं वो दोनों रंग।

कभी हँसते हैं,कभी रोते हैं ,
कभी जागते,कभी सोते हैं।

यूँही वह बदल कर रुप मेरा,
करते रहते हैं मुझको तंग।

मुझमे ही छुपे हैं वो दोनों रंग।

बन जाते हैं भगवान कभी,
कभी लगते हैं शैतान वही,
कुछ भी है पर इस रंग बिना,
तन में मेरे है प्राण नहीं।

रंगीन ये मन क्यों ना समझ सका,
"मै" से "मै" की यह कैसी जंग?

मुझमे ही छुपे हैं वो दोनों रंग।

दर्पण से मुझे दिखलाते रंग,
अंतरमन के वे सारे अंग,
जिससे मानव भगवान बने,
चंदन से भी लिपटा रहे भुजंग।

जिसके बिन जीवन खाली,उजड़ा,
मन बन जाता है कोई पतंग।

मुझमे ही छुपे हैं वो दोनों रंग।

18 comments:

रविकर said...

बधाई ||

संजय भास्कर said...

बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति
शब्द संयोजन बहुत कमाल का खुबसूरत रचना

mahendra srivastava said...

बहुत सुंदर

सच कहूं तो कभी कभी ही ऐसी रचनाएं पढने को मिलती हैं।
लाजवाब प्रस्तुति
शुभकामनाएं

कविता रावत said...

bahut badiya saarthak rachna..

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

"मै" से "मै" का ये कैसा जंग ?
मुझमे ही छिपा है वो दोनो रंग |
..........आत्मसमीक्षा करती सुंदर कृति

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

मन के अंतर्द्वंद को कहती सुन्दर रचना ...मन में दोनों पक्ष होते हैं ..अच्छा भी और बुरा भी ...अच्छी अभिव्यक्ति

रेखा said...

गहरी और सार्थक अभिव्यक्ति

संध्या शर्मा said...

"मै" से "मै" का ये कैसा जंग ?
मुझमे ही छिपा है वो दोनो रंग

मन के अंतर्द्वंद को सुन्दर शब्दों से सजाया है... गहन अभिव्यक्ति...

प्रवीण पाण्डेय said...

द्वन्द रंग।

Rajesh Kumari said...

aitah aur bahaya insaan ke dono hi roopon ko vyakt karti kavita sunder abhivyakti.

vishy said...

वाकई बहुत सुंदर रचना है

Chinmayee said...

सुन्दर रचना के साथ बहुत सुन्दर प्रस्तुति !
सादर
तृप्ति

sushma 'आहुति' said...

बहुत सुन्दर भावाभिवय्क्ति....

वाणी गीत said...

सुन्दर गीत !

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत सुन्दर...बधाई

Manav Mehta said...

bahut sundar rachna satyam ji....

सुमन'मीत' said...

lajwab.....

vidhya said...

बधाई ||