Tuesday, August 16, 2011

मृत्यु-पीड़ा

उर की व्यथा उर में रह गयी,
हर संताप तिमिर में घुल गयी।
श्वेत अश्व का धावक आया,
आत्मा,परमात्मा से मिल गयी।

अदृश्य लकीरें अनहोनी की,
तन के आद्यांग में फूटी,
तन हुआ जहान से वैरागी,
आत्मा जो तन से है रुठी।

सारे क्षण यूँ थम गये,
आँखों में आँसू जम गये।

हर ख्वाहिश रह गयी अब अधूरी,
जहान से बढ़ गयी मेरी दूरी।

तन की थी ये व्यापक मजबूरी,
मृत्यु है क्यों इतनी बुरी?

सहमें से सारे मंजर मेरे,
जुदाई का वियोग है मुझको घेरे।

अपने साथी अब छूट गये,
हर ख्वाब अधूरे टूट गये।

कविता भी मेरी थी अधूरी,
अँधेरी रातों में चमकती फुलझड़ी,
लगती थी दुनिया कितनी सिंदूरी,
हुई ना मेरी इक माँग भी पूरी।

चाहतों का दीया बूझ गया,
नभ से इक सितारा टूट गया।

श्वास का दीपक जो बुझा,
जिंदगी हो गई बस जुदा जुदा।

जीवन से जो मै रुठा,
पाया जग तो था झूठा।

जिसके लिये था मै सब कुछ,
मेरे बाद भी तो है वो खुश।

मेरी कहानी का हो गया अंत,
राही था अब मै उन राहों का,
मँजिल था जिनका बस अनंत।

बढ़ गया बेहिचक प्राण सा मै,
दुनिया से बिल्कुल अंजान सा मै।
ठोकर जो मिली तो ठहर गया,
सुख दुख का सारा पहर गया।

पीड़ा थी कितनी उर में भरी,
खत्म हुई जीवन की कड़ी।

पाया मैने वो सच्चा ज्ञान,
कब से था जिससे मै अंजान।

प्रकाश की नई परिभाषा,
आत्मा को मिली जो इक आशा।

तन को चुपके से सुला दिया,
मृत्यु पीड़ा को भूला दिया।

10 comments:

vidhya said...

आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें
वाह ...बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

वन्दना said...

वाह बेह्द गहन और सार्थक प्रस्तुति।

Minakshi Pant said...

बहुत खूबसूरत रचना जिसमे दर्द को प्रकट करने कि कोशिश में सफल :)
सुन्दर रचना |

Sunil Kumar said...

जीवन के तथ्यों के साथ साथ दर्द को भी निभाने की भी कोशिश अच्छी लगी .....

prerna argal said...

bahut sunder mratyu ki peedaa aur usaki sachchaai ko bataati hui sunder prastuti.badhaai aapko.

शालिनी कौशिक said...

सहमें से सारे मंजर मेरे,
जुदाई का वियोग है मुझको घेरे।
बहुत ह्रदय विदारक प्रस्तुति सत्यम जी.

Dr Varsha Singh said...

उफ....पीड़ा की सहज अभिव्यक्ति...

बहुत सुन्दर एवं मर्मस्पर्शी रचना !

प्रवीण पाण्डेय said...

सुन्दर और गहन अभिव्यक्ति।

रश्मि प्रभा... said...

behtareen bhaw

Dr (Miss) Sharad Singh said...

बेहतरीन प्रस्‍तुति ......